कानपुर। सोशल मीडिया पर हुई एक दोस्ती ने रिटायर्ड बैंक मैनेजर की जिंदगी की जमा-पूंजी पर ऐसा डाका डाला कि देखते ही देखते ₹2.52 करोड़ की रकम साइबर ठगों के खातों में पहुंच गई। हनी ट्रैप और क्रिप्टोकरेंसी निवेश के नाम पर अंजाम दिए गए इस बहुचर्चित साइबर धोखाधड़ी मामले में जांच एजेंसियों को एक और बड़ी सफलता मिली है। मामले में चौथे आरोपी की गिरफ्तारी के साथ ही करोड़ों रुपये की ठगी के पीछे काम कर रहे नेटवर्क की परतें खुलने लगी हैं।
जांच के अनुसार, नवाबगंज निवासी रिटायर्ड बैंक मैनेजर अनिल कुमार सिंह चौहान को वर्ष 2025 में सोशल मीडिया के माध्यम से एक महिला ने संपर्क किया। महिला ने खुद को इरा रेड्डी बताकर उनसे लगातार बातचीत शुरू की और धीरे-धीरे विश्वास कायम कर लिया। कुछ ही समय में यह बातचीत कथित तौर पर भावनात्मक संबंधों का रूप लेने लगी, जिसके बाद पीड़ित को क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करने के लिए प्रेरित किया गया।
आरोप है कि महिला ने निवेश पर असाधारण और तेज मुनाफे का भरोसा दिलाया। शुरुआत में कथित तौर पर कुछ सकारात्मक संकेत दिखाकर विश्वास मजबूत किया गया, जिसके बाद पीड़ित ने बड़ी रकम निवेश करनी शुरू कर दी। निवेश के लिए अतिरिक्त धन जुटाने के उद्देश्य से उन्होंने फ्लैट खरीदने का बहाना बनाकर लगभग ₹1.98 करोड़ का ऋण भी लिया। इसके बाद अलग-अलग चरणों में कुल ₹2.52 करोड़ की राशि ठगों के नियंत्रण वाले खातों में स्थानांतरित कर दी गई।
जब निवेश की गई रकम वापस लेने का प्रयास किया गया तो कथित रूप से नए शुल्क, टैक्स और अन्य तकनीकी कारण बताकर भुगतान टाल दिया गया। धीरे-धीरे पीड़ित को एहसास हुआ कि वह एक संगठित साइबर ठगी का शिकार बन चुके हैं। शिकायत दर्ज होने के बाद मामले की विस्तृत जांच शुरू की गई।
तकनीकी विश्लेषण, बैंकिंग रिकॉर्ड और मोबाइल नंबरों की निगरानी के आधार पर जांच टीम ने कई संदिग्ध खातों की पहचान की। इसी क्रम में बिजनौर जिले के चांदपुर खानपुर गांव निवासी विपिन कुमार को गिरफ्तार किया गया। जांच में पता चला कि ठगी से प्राप्त धनराशि में से लगभग ₹45 लाख उसके बैंक खाते में ट्रांसफर किए गए थे। अधिकारियों का मानना है कि आरोपी धन के लेनदेन और उसे विभिन्न खातों में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था।
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अब तक इस मामले में चार लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। जांच एजेंसियों का कहना है कि नेटवर्क में शामिल अन्य संदिग्धों की तलाश भी जारी है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि गिरोह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, व्हाट्सऐप समूहों और फर्जी क्रिप्टो निवेश वेबसाइटों का इस्तेमाल कर लोगों को ऊंचे रिटर्न का लालच देता था। निवेशकों को यह विश्वास दिलाया जाता था कि उनकी रकम तेजी से बढ़ रही है, जबकि वास्तव में पूरा सिस्टम धोखाधड़ी के उद्देश्य से तैयार किया गया था।
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि ठगी की रकम का ट्रांजैक्शन ट्रेल छिपाने के लिए धन को कई राज्यों के बैंक खातों में घुमाया गया। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और असम सहित विभिन्न राज्यों में मौजूद खातों का उपयोग कर रकम को छोटे-छोटे हिस्सों में स्थानांतरित किया गया, जिससे जांच को भ्रमित किया जा सके।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, साइबर अपराधी अब केवल तकनीकी कमजोरियों का फायदा नहीं उठा रहे हैं, बल्कि सोशल इंजीनियरिंग और भावनात्मक हेरफेर को सबसे प्रभावी हथियार बना चुके हैं। हनी ट्रैप और निवेश घोटालों का संयोजन पीड़ितों को मानसिक रूप से प्रभावित करता है, जिससे वे बिना पर्याप्त सत्यापन के बड़ी रकम ट्रांसफर कर देते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी ऑनलाइन निवेश योजना में पैसा लगाने से पहले प्लेटफॉर्म की वैधता, नियामकीय स्थिति और वास्तविक वित्तीय रिकॉर्ड की जांच करना बेहद आवश्यक है। वहीं, जांच एजेंसियां मामले में फरार आरोपियों की तलाश में लगातार छापेमारी कर रही हैं और उम्मीद है कि आने वाले दिनों में इस बहु-राज्यीय साइबर ठगी नेटवर्क से जुड़े और भी अहम खुलासे सामने आ सकते हैं।
