आपदा राहत के लिए बनाए गए अधिवक्ता कोष से रकम निकालने का मामला सामने आया; हस्ताक्षर और मुहर जालसाजी के आरोपों के बीच बैंकिंग प्रक्रिया भी जांच के दायरे में

वकीलों के राहत कोष में ₹8.75 लाख की कथित सेंध: पूर्व संयोजक समेत 11 पर मुकदमा, फर्जी चेक से निकासी का आरोप

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By Roopa
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लखनऊ/बलरामपुर। अधिवक्ताओं और उनके परिवारों को आपातकालीन आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाए गए अधिवक्ता आपदा राहत कोष में कथित वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आने के बाद बलरामपुर में कानूनी समुदाय के बीच हलचल मच गई है। राहत कोष से ₹8.75 लाख की कथित हेराफेरी के आरोप में पूर्व संयोजक सहित 11 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोप है कि फर्जी हस्ताक्षरों और नकली मुहरों का इस्तेमाल कर चेकों के माध्यम से कोष की राशि निकाली गई।

मामला तब उजागर हुआ जब कोष से जुड़े पदाधिकारियों ने बैंक खाते का विवरण प्राप्त कर लेनदेन की समीक्षा की। प्रारंभिक जांच में कई संदिग्ध निकासियां सामने आईं, जिसके बाद पूरे घटनाक्रम को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए। शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

जानकारी के अनुसार, अधिवक्ता आपदा राहत समिति का बैंक खाता उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक की बलरामपुर शाखा में संचालित होता है। यह खाता समिति के अधिकृत पदाधिकारियों के संयुक्त हस्ताक्षरों के आधार पर संचालित किया जाता है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि समिति के पूर्व संयोजक शशांक कुमार त्रिपाठी, जिन्हें दिसंबर 2025 में आमसभा की बैठक के दौरान पद से हटा दिया गया था, बाद में भी समिति की बैंकिंग गतिविधियों तक पहुंच बनाए रखने में सफल रहे।

आरोप है कि उन्होंने अप्रैल और जून 2026 के दौरान बैंक से 50 चेक पत्तियां प्राप्त कीं। इसके बाद कथित रूप से अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं के फर्जी हस्ताक्षर और नकली मुहरें तैयार कर कई चेक जारी किए गए। इन्हीं चेकों के आधार पर कुल ₹8.75 लाख की राशि विभिन्न व्यक्तियों के नाम पर निकाली गई।

प्राथमिकी के अनुसार, निकाली गई रकम में कई व्यक्तियों के नाम पर ₹1-1 लाख के भुगतान दर्ज किए गए। इसके अलावा कुछ अन्य खातों में ₹25 हजार और ₹50 हजार की रकम स्थानांतरित किए जाने का भी उल्लेख है। समिति का दावा है कि ये भुगतान वास्तविक नहीं थे और संबंधित चेकों पर मौजूद हस्ताक्षर अधिकृत पदाधिकारियों के नहीं हैं।

मामले ने उस समय गंभीर रूप ले लिया जब 8 जून को समिति के पदाधिकारियों ने बैंक स्टेटमेंट प्राप्त कर हालिया लेनदेन का मिलान किया। कई संदिग्ध निकासियां सामने आने पर समिति की आमसभा की बैठक बुलाई गई, जिसमें संबंधित चेकों और दस्तावेजों की समीक्षा की गई। बैठक में अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं ने कथित तौर पर स्पष्ट किया कि विवादित चेकों पर मौजूद हस्ताक्षर उनके नहीं हैं।

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समिति ने निष्कर्ष निकाला कि राहत कोष से धन निकालने के लिए जालसाजी का सहारा लिया गया और नकली दस्तावेजों का उपयोग कर बैंकिंग प्रणाली को भ्रमित किया गया। इसके बाद बार एसोसिएशन की ओर से औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि यह पूरी कार्रवाई सुनियोजित साजिश के तहत की गई और कई लोगों की मिलीभगत से राहत कोष की रकम निकाली गई। मामले में बैंकिंग प्रक्रियाओं को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिरकार चेक पुस्तिकाएं किस प्रक्रिया के तहत जारी की गईं और कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भुगतान कैसे स्वीकृत हो गया।

पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जांच एजेंसियां बैंक रिकॉर्ड, चेक जारी करने की प्रक्रिया, भुगतान प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की पहचान और विवादित चेकों पर मौजूद हस्ताक्षरों की सत्यता की पड़ताल कर रही हैं। डिजिटल एवं दस्तावेजी साक्ष्यों का भी विश्लेषण किया जा रहा है ताकि धन के प्रवाह और संभावित लाभार्थियों की भूमिका स्पष्ट हो सके।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि राहत कोष जैसे संवेदनशील वित्तीय संसाधनों में पारदर्शिता और बहुस्तरीय निगरानी अत्यंत आवश्यक है। ऐसे कोष संकट की घड़ी में अधिवक्ताओं और उनके परिवारों के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं, इसलिए किसी भी प्रकार की अनियमितता पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा सकती है।

फिलहाल मामले की जांच जारी है। पुलिस का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों और वित्तीय रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। वहीं, अधिवक्ता समुदाय पूरे प्रकरण में निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहा है।

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