आतंकवाद से नाम जुड़ने और गिरफ्तारी का डर दिखाकर रची गई साजिश; फर्जी सरकारी दस्तावेज और RBI की नकली रसीद भेजकर जीता भरोसा, साइबर थाना जांच में जुटा

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 5 लाख की साइबर ठगी: NIA-ATS अधिकारी बनकर बुजुर्ग को दो दिन तक रखा निगरानी में, FD तुड़वाकर ऐंठी रकम

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By Roopa
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गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां साइबर अपराधियों ने खुद को राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों का अधिकारी बताकर एक बुजुर्ग व्यक्ति से ₹5 लाख की ठगी कर ली। आरोपियों ने आतंकवाद से संबंध होने का डर दिखाते हुए पीड़ित और उनकी पत्नी को लगभग दो दिनों तक व्हाट्सएप कॉल के जरिए निगरानी में रखा और जांच प्रक्रिया का हवाला देकर उनकी जमा पूंजी अपने खाते में ट्रांसफर करा ली। मामला सामने आने के बाद साइबर थाना पुलिस ने केस दर्ज कर डिजिटल साक्ष्यों और बैंकिंग लेनदेन की जांच शुरू कर दी है।

जानकारी के अनुसार, बेलघाट क्षेत्र के चौतरा तिवारी गांव निवासी धनुषधारी तिवारी को फरवरी में एक फोन कॉल प्राप्त हुई। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को राष्ट्रीय जांच एजेंसी का अधिकारी बताते हुए दावा किया कि उनके आधार कार्ड का उपयोग कर जम्मू-कश्मीर में एक बैंक खाता खोला गया है। कथित अधिकारी ने यह भी कहा कि उस खाते का संबंध एक गिरफ्तार आतंकवाद संदिग्ध से पाया गया है और पूछताछ के लिए उन्हें तत्काल जांच एजेंसी के कार्यालय में उपस्थित होना होगा।

जब बुजुर्ग ने इतनी कम अवधि में दूसरे शहर पहुंचने में असमर्थता जताई, तब कुछ समय बाद एक अन्य व्यक्ति ने संपर्क कर स्वयं को आतंकवाद निरोधक दस्ते का अधिकारी बताया। इसके बाद कथित जांच की आड़ में लगातार व्हाट्सएप कॉल और बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। आरोपियों ने पीड़ित परिवार को यह विश्वास दिलाया कि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और किसी भी प्रकार की जानकारी बाहर साझा करने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

जांच के नाम पर ठगों ने बुजुर्ग और उनकी पत्नी को घर में ही रहने तथा किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क नहीं करने के निर्देश दिए। इसी दौरान उन्हें लगातार निगरानी में रखा गया, जिसे साइबर अपराध की भाषा में ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहा जाता है। अपराधियों ने दावा किया कि मामले की जांच पूरी होने तक एक निश्चित राशि सुरक्षा जमा के रूप में जमा करनी होगी, जो जांच समाप्त होने पर वापस कर दी जाएगी।

डर और मानसिक दबाव के कारण पीड़ित ने अपनी सावधि जमा (एफडी) तुड़वा दी। इसके बाद आरोपियों द्वारा बताए गए बैंक खाते में ₹5 लाख ट्रांसफर कर दिए गए। रकम जमा होने के बाद ठगों ने पीड़ित को भारतीय रिजर्व बैंक की कथित रसीद और भारत सरकार की मुहर लगे दस्तावेज भेजे। इन दस्तावेजों को देखकर परिवार को लगा कि वास्तव में कोई आधिकारिक जांच चल रही है और धनराशि सुरक्षा उद्देश्य से जमा कराई गई है।

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हालांकि अगले ही दिन कथित अधिकारियों के सभी मोबाइल नंबर बंद हो गए। संपर्क टूटने के बाद परिवार को संदेह हुआ और धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि वे एक सुनियोजित साइबर ठगी का शिकार बन चुके हैं। इसके बाद पीड़ित परिवार ने साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई और संबंधित थाने में भी मामला दर्ज कराया गया।

जांच एजेंसियां अब उन बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल माध्यमों की पड़ताल कर रही हैं जिनका उपयोग इस अपराध को अंजाम देने में किया गया। वित्तीय लेनदेन की ट्रेल, कॉल रिकॉर्ड, व्हाट्सएप संचार और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का विश्लेषण किया जा रहा है ताकि आरोपियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार किया जा सके।

साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट आज साइबर अपराधियों का सबसे प्रभावी सोशल इंजीनियरिंग हथियार बन चुका है। अपराधी पुलिस, सीबीआई, एनआईए, ईडी या अन्य सरकारी एजेंसियों का नाम लेकर लोगों में भय पैदा करते हैं और फिर कानूनी कार्रवाई, मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद या बैंकिंग अपराधों का हवाला देकर उन्हें मानसिक दबाव में ले आते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कोई भी सरकारी एजेंसी फोन, वीडियो कॉल या व्हाट्सएप के जरिए किसी नागरिक को डिजिटल अरेस्ट नहीं करती और न ही जांच के नाम पर किसी निजी खाते में धन जमा कराने को कहती है।

फिलहाल मामले की जांच जारी है। अधिकारियों का कहना है कि उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है। विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं को सरकारी अधिकारी बताकर धन जमा कराने या गोपनीय जांच का हवाला देकर दबाव बनाए तो तत्काल कॉल समाप्त करें, आधिकारिक हेल्पलाइन से सत्यापन करें और बिना देर किए साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं।

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