जम्मू-कश्मीर में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही कार्रवाई के तहत एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) को सोमवार को बड़ी सफलता मिली है। अनंतनाग की विशेष भ्रष्टाचार अदालत ने लंबे समय से लंबित पहलगाम राशन घोटाले में पांच पूर्व स्टोरकीपरों को दोषी करार दिया है। यह मामला 1990 में दर्ज हुआ था और इसमें खाद्यान्न तथा खाली बोरियों के गबन का आरोप था।
अदालत ने जिन आरोपियों को दोषी पाया है उनमें अब्दुल खालिक शाह, गुलाम नबी मीर, मोहम्मद शफी राथर, गुलाम हसन हाजम और मुजफ्फर अहमद बिछू शामिल हैं। ये सभी उस समय खाद्य एवं आपूर्ति विभाग, पहलगाम सर्कल में स्टोरकीपर के पद पर कार्यरत थे।
मामले के अनुसार वर्ष 1989 के अप्रैल से सितंबर के बीच करीब 3,64,235 रुपये मूल्य के खाद्यान्न और संबंधित सामग्री का गबन किया गया था। यह अनियमितता उस समय सामने आई जब विभागीय स्तर पर की गई जांच में स्टॉक और वितरण रिकॉर्ड में भारी अंतर पाया गया।
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शिकायत के आधार पर तत्कालीन उप निदेशक, खाद्य एवं आपूर्ति विभाग, श्रीनगर ने 1989 में विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी। इसके बाद 1990 में तत्कालीन विजिलेंस संगठन ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की, जो बाद में एसीबी में शामिल हो गया।
लंबी जांच प्रक्रिया के बाद 2003 में आरोप पत्र दाखिल किया गया था। इसके बाद अदालत में वर्षों तक सुनवाई चलती रही और अंततः 20 अप्रैल 2026 को विशेष न्यायाधीश मसारत रूही की अदालत ने सभी पांचों आरोपियों को भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम और रणबीर दंड संहिता की धाराओं के तहत दोषी ठहराया।
अदालत ने मामले में सजा की मात्रा तय करने के लिए अगली तारीख 24 अप्रैल 2026 निर्धारित की है। इस फैसले को भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इसी बीच एसीबी ने एक अन्य मामले में भी बड़ी कार्रवाई करते हुए कुपवाड़ा के तत्कालीन खंड विकास अधिकारी समेत पांच लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है। यह मामला वर्ष 2021 में एक शिकायत पोर्टल के माध्यम से सामने आया था।
जांच में सामने आया कि आरोपियों ने सरकारी विकास योजनाओं के तहत आवंटित धनराशि में भारी अनियमितताएं कीं। तत्कालीन बीडीओ अब्दुल मजीद गनई, कनिष्ठ सहायक, एक एमआईएसओ/जीआरएस कर्मी तथा दो निजी व्यक्तियों पर मिलकर फर्जी फंड ट्रांसफर ऑर्डर तैयार करने का आरोप है।
इन लोगों पर यह भी आरोप है कि उन्होंने जॉब कार्ड धारकों के नाम पर मजदूरी भुगतान दिखाकर धन का दुरुपयोग किया और कई मामलों में ऐसे कार्यों के लिए भुगतान कर दिया गया जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं थे।
जांच में यह भी पाया गया कि कुछ आधिकारिक रिकॉर्ड नष्ट किए गए या जानबूझकर उपलब्ध नहीं कराए गए ताकि जांच प्रभावित हो सके। डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्रों को भी प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे संदेह और गहरा हो गया।
इस पूरे प्रकरण में लगभग 4.86 लाख रुपये के सरकारी धन के नुकसान की बात सामने आई है। एसीबी ने सभी आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश सहित विभिन्न धाराओं में मामला अदालत में प्रस्तुत किया है।
एसीबी के अनुसार ये दोनों कार्रवाईयां सरकारी प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। विभाग ने कहा कि ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई से भविष्य में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी और विकास योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंच सकेगा। साथ ही जांच एजेंसियों ने स्पष्ट किया कि लंबित मामलों को भी प्राथमिकता पर निपटाया जाएगा ताकि न्याय प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके।
अदालत के फैसले और चार्जशीट दाखिल होने के बाद क्षेत्र में इस कार्रवाई को लेकर चर्चा तेज हो गई है और इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी सख्त रुख के रूप में देखा जा रहा है। प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही बढ़ाने की मांग भी तेज हो रही है “भ्रष्टाचार विरोधी अभियान”
