नई दिल्ली। देश में डिजिटल पेमेंट सिस्टम ने जहां लेनदेन को सेकेंडों का खेल बना दिया है, वहीं अब साइबर अपराध भी उसी गति से “रियल टाइम” में अंजाम दिए जा रहे हैं। ताजा आंकड़े और विशेषज्ञों के विश्लेषण एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं—जहां पहले धोखाधड़ी का पता लगने में समय लगता था, अब पैसा ट्रांसफर होते ही मिनटों में कई खातों के जरिए गायब कर दिया जाता है। इस बदलते पैटर्न ने डिजिटल इंडिया के सिक्योरिटी फ्रेमवर्क पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पिछले एक दशक में भारत का डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम करीब 38 गुना तक बढ़ा है। UPI जैसे प्लेटफॉर्म ने भुगतान को आसान और सर्वसुलभ बना दिया है। लेकिन इसी के साथ साइबर फ्रॉड के मामलों में विस्फोट हुआ है। 2021 में जहां 2.6 लाख मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर करीब 28 लाख पहुंच गई। इन मामलों में कुल ₹22,931 करोड़ की ठगी सामने आई, जो इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है।
बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े आंकड़े इस खतरे को और स्पष्ट करते हैं। वित्त वर्ष 2025 में बैंक फ्रॉड की कुल राशि ₹36,014 करोड़ तक पहुंच गई, जो पिछले साल की तुलना में लगभग तीन गुना है। हालांकि मामलों की संख्या में कमी आई है, लेकिन प्रति केस नुकसान कहीं ज्यादा बड़ा हो गया है। विशेषज्ञ इसे साइबर अपराधियों की रणनीति में बदलाव मानते हैं, जहां अब छोटे-छोटे फ्रॉड की जगह बड़े और सुनियोजित हाई-वैल्यू स्कैम को प्राथमिकता दी जा रही है।
जांच में सामने आया है कि साइबर अपराध अब व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि एक संगठित नेटवर्क के रूप में काम कर रहा है। बैंक और फिनटेक प्लेटफॉर्म पर लाखों अकाउंट टेकओवर के प्रयास दर्ज किए गए हैं, जिनमें से कई सफल भी रहे। इसके अलावा 11 लाख से ज्यादा संदिग्ध “म्यूल अकाउंट” की पहचान की गई है, जिनका इस्तेमाल चोरी के पैसे को तेजी से अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करने के लिए किया जाता है। यह प्रक्रिया इतनी तेज होती है कि कुछ ही मिनटों में रकम कई परतों में बंटकर ट्रेस करना मुश्किल हो जाता है।
साइबर ठगी का तरीका भी पूरी तरह बदल चुका है। पहले जहां फिशिंग कॉल, OTP शेयरिंग या फर्जी लिंक तक सीमित मामले सामने आते थे, अब “फ्रॉड-एज-ए-सर्विस” का नया मॉडल उभर चुका है। इसमें रेडीमेड स्कैम टूल्स, चोरी किया गया डेटा, फर्जी KYC डॉक्यूमेंट और ऑटोमेटेड कॉलिंग स्क्रिप्ट आसानी से उपलब्ध हैं। इसका मतलब यह है कि अब साइबर अपराध करने के लिए गहरी तकनीकी जानकारी जरूरी नहीं रह गई है।
इस बढ़ते खतरे के केंद्र में “सिंथेटिक आइडेंटिटी” का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इसमें असली और नकली जानकारी को मिलाकर एक नई पहचान बनाई जाती है, जो सिस्टम की जांच में आसानी से पास हो जाती है। शुरुआत में यह पहचान सामान्य यूजर की तरह व्यवहार करती है, लेकिन बाद में बड़े स्तर पर धोखाधड़ी के लिए इस्तेमाल होती है। डिजिटल लेंडिंग सेक्टर में “लोन स्टैकिंग” इसका बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है, जहां आरोपी कुछ ही मिनटों में कई प्लेटफॉर्म से लोन लेकर गायब हो जाते हैं।
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने इस खतरे को और जटिल बना दिया है। AI की मदद से अब ऐसे फर्जी कॉल, मैसेज और डॉक्यूमेंट तैयार किए जा रहे हैं, जो असली से अलग पहचानना बेहद मुश्किल हो गया है। कई मामलों में पीड़ित को यह एहसास तक नहीं होता कि वह किसी साइबर अपराधी से बात कर रहा है, जब तक कि उसके खाते से पैसा निकल नहीं जाता।
तेजी से बढ़ते डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम अभी भी पीछे नजर आ रहे हैं। ज्यादातर बैंक और वित्तीय संस्थान अभी भी रिएक्टिव मॉडल पर काम कर रहे हैं, जहां ट्रांजेक्शन होने के बाद जांच शुरू होती है। UPI जैसे प्लेटफॉर्म हर महीने अरबों ट्रांजेक्शन प्रोसेस कर रहे हैं, जिससे संदिग्ध गतिविधियों को समय रहते रोकना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हाई-वैल्यू ट्रांजेक्शन में कुछ सेकंड या मिनट की देरी लागू करने से फ्रॉड को काफी हद तक रोका जा सकता है। इससे सिस्टम को संदिग्ध लेनदेन की पहचान करने का समय मिल सकेगा। अनुमान के मुताबिक, मौजूदा तकनीकों का सही उपयोग किया जाए तो ₹1,120 करोड़ तक की ठगी रोकी जा सकती थी।
इस पूरे मामले पर प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह कहते हैं, “आज साइबर फ्रॉड एक नेटवर्क आधारित खतरा बन चुका है। अपराधी तकनीक, स्पीड और सिस्टम की कमजोरियों का एक साथ फायदा उठा रहे हैं। जब तक रियल-टाइम मॉनिटरिंग और मजबूत सुरक्षा तंत्र विकसित नहीं किए जाएंगे, तब तक इस खतरे को रोकना मुश्किल रहेगा।”
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मौजूदा आंकड़े इस समस्या की पूरी तस्वीर नहीं दिखाते। कई मामले रिपोर्ट ही नहीं होते, जबकि कुछ नुकसान कंपनियां खुद वहन कर लेती हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित साइबर गिरोहों को ट्रैक करना भी आसान नहीं है।
डिजिटल इंडिया के इस दौर में अब असली चुनौती केवल तेज पेमेंट सिस्टम तैयार करना नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित बनाना है। बदलते साइबर खतरों के बीच अब फोकस “पोस्ट-फ्रॉड एक्शन” से हटाकर “प्री-फ्रॉड प्रिवेंशन” पर लाना जरूरी हो गया है, ताकि ठगी को होने से पहले ही रोका जा सके।
