नई दिल्ली। देश में तेजी से बढ़ते साइबर अपराध (Cyber Crime) को रोकने के लिए केंद्र सरकार एक व्यापक राष्ट्रीय अभियान की तैयारी में है। इस अभियान में जमीनी स्तर पर जागरूकता (Awareness) और अत्याधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित निगरानी—दोनों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसका उद्देश्य खास तौर पर उन लोगों को सुरक्षित करना है, जो डिजिटल सिस्टम से नए जुड़े हैं या आसानी से ऑनलाइन ठगी (Online Fraud) का शिकार बनते हैं।
सूत्रों के अनुसार, इस योजना के तहत आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी स्टाफ, बीमा सखी, बैंक सखी और पेंशन सखी जैसे स्थानीय नेटवर्क को सक्रिय किया जाएगा। ये लोग गांव-गांव जाकर नागरिकों को डिजिटल भुगतान (Digital Payment), साइबर सुरक्षा (Cyber Security) और ठगी से बचने के तरीके सिखाएंगे। सरकार का मानना है कि स्थानीय स्तर पर भरोसेमंद लोगों के जरिए जागरूकता फैलाने से इसका असर ज्यादा प्रभावी होगा।
साइबर अपराध के आंकड़े इस पहल की गंभीरता को दर्शाते हैं। वर्ष 2025 में देशभर में करीब 28 लाख साइबर अपराध शिकायतें दर्ज की गईं। वहीं 2024 और 2025 के दौरान कुल मिलाकर लगभग ₹44,000 करोड़ का आर्थिक नुकसान हुआ। खास तौर पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) जैसे फ्रॉड तेजी से बढ़े हैं, जिनसे 2022 के बाद से करीब ₹30,000 करोड़ की ठगी हो चुकी है।
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सरकार का यह अभियान केवल जागरूकता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें तकनीकी स्तर पर भी बड़ा बदलाव शामिल है। एक AI आधारित रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम तैयार किया जा रहा है, जो संदिग्ध लेनदेन (Suspicious Transactions) को तुरंत पहचानकर रोक सकेगा। उदाहरण के लिए, अचानक बड़ी रकम का ट्रांसफर, एक साथ कई संदिग्ध खातों में पैसे भेजना या घबराहट में किए गए ट्रांजैक्शन पर सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी कर सकता है और उन्हें रोक सकता है।
सूत्रों के मुताबिक, बैंकों के लिए भी स्पष्ट लक्ष्य तय किए जाएंगे। उन्हें ग्राहकों को सुरक्षित डिजिटल व्यवहार (Safe Digital Behaviour) के लिए जागरूक करना होगा और धोखाधड़ी की घटनाओं पर तेज प्रतिक्रिया (Quick Response) सुनिश्चित करनी होगी। इसके साथ ही शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal System) को भी मजबूत किया जाएगा, ताकि पीड़ितों को समय पर मदद मिल सके।
इस पहल का विस्तार शिक्षा क्षेत्र तक भी किया जाएगा। माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर छात्रों के लिए वित्तीय और डिजिटल साक्षरता (Financial & Digital Literacy) से जुड़े विशेष मॉड्यूल तैयार किए जाएंगे। इसके लिए National Centre for Financial Education (NCFE) विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और ट्रस्ट के साथ मिलकर अभियान चलाएगा।
साइबर अपराध को लेकर न्यायपालिका और नीति-निर्माताओं में भी गहरी चिंता है। हाल ही में देश के मुख्य न्यायाधीश ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों को सबसे खतरनाक साइबर अपराधों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे अपराध न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि पीड़ितों को मानसिक रूप से भी गहरा आघात (Psychological Trauma) देते हैं। कई मामलों में लोग शर्म या डर के कारण शिकायत दर्ज नहीं कराते, जिससे अपराधियों का मनोबल और बढ़ता है।
सरकार ने पहले ही एक उच्च स्तरीय अंतर-विभागीय समिति (Inter-Departmental Committee) का गठन कर दिया है, जो सिस्टम की कमजोरियों को दूर करने और दीर्घकालिक समाधान तैयार करने पर काम कर रही है। इस समिति का लक्ष्य एक मजबूत रियल-टाइम सुरक्षा तंत्र (Real-Time Protection System) विकसित करना है।
प्रख्यात साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी Prof. Triveni Singh का कहना है, “आज के साइबर अपराधी तकनीक से ज्यादा मानव मनोविज्ञान (Human Psychology) को निशाना बनाते हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों में डर और जल्दबाजी का इस्तेमाल कर पीड़ित को तुरंत निर्णय लेने पर मजबूर किया जाता है। जब तक लोगों में जागरूकता और संदेह की आदत विकसित नहीं होगी, तब तक केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं होंगे।”
विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक साइबर ठगी (Modern Cyber Fraud) में डर, लालच और तात्कालिकता (Urgency) जैसे भावनात्मक तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है। ठग अक्सर लोगों को भ्रमित कर उन्हें अनजाने में ‘म्यूल अकाउंट’ (Mule Account) के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जिससे अवैध धन को इधर-उधर किया जाता है।
ऐसे में सरकार की यह दोहरी रणनीति—जहां एक ओर स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाई जाएगी और दूसरी ओर AI आधारित निगरानी को मजबूत किया जाएगा—डिजिटल ठगी के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा कवच (Strong Protective Shield) साबित हो सकती है।
