फर्जी पहचान, डीपफेक और AI-संचालित साइबर हमलों का खतरा बढ़ा; बैंकिंग क्षेत्र में धोखाधड़ी रोकने के लिए तकनीकी निवेश तेज करने की तैयारी

AI ने बढ़ाई बैंकों की चिंता: भारत के 84% बैंकिंग प्रमुखों ने धोखाधड़ी से बढ़ते नुकसान की चेतावनी दी

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By Roopa
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नई दिल्ली। भारत का बैंकिंग क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित साइबर खतरों और वित्तीय धोखाधड़ी के नए तरीकों से जूझ रहा है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश के 84 प्रतिशत बैंकिंग नेताओं ने माना है कि पिछले वर्ष के दौरान धोखाधड़ी से होने वाले वित्तीय नुकसान में वृद्धि दर्ज की गई है। रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि AI तकनीक के बढ़ते उपयोग ने साइबर अपराधियों को पहले से अधिक सक्षम बना दिया है, जिससे बैंकिंग प्रणाली के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

रिपोर्ट के अनुसार बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन बैंकिंग और दूरस्थ ग्राहक सेवाओं के विस्तार के साथ-साथ धोखाधड़ी के तरीके भी अधिक जटिल और तकनीकी रूप से उन्नत हो गए हैं। विशेष रूप से जनरेटिव AI, डीपफेक तकनीक और स्वचालित सोशल इंजीनियरिंग टूल्स का इस्तेमाल अपराधियों द्वारा ग्राहकों और वित्तीय संस्थानों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।

सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश बैंकिंग नेताओं ने कहा कि फर्जी पहचान आधारित धोखाधड़ी, अकाउंट टेकओवर, डिजिटल भुगतान घोटाले और सिंथेटिक पहचान का उपयोग आने वाले वर्षों में सबसे बड़े जोखिमों में शामिल रहेंगे। कई अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया कि AI आधारित हमलों का पता लगाना पारंपरिक सुरक्षा प्रणालियों के लिए लगातार कठिन होता जा रहा है।

रिपोर्ट में बताया गया कि साइबर अपराधी अब ऐसे डीपफेक ऑडियो और वीडियो तैयार करने में सक्षम हैं जो वास्तविक व्यक्तियों की आवाज और चेहरे की नकल कर सकते हैं। इससे बैंक कर्मचारियों, ग्राहकों और संस्थानों को धोखा देने की संभावनाएं बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक का इस्तेमाल फर्जी लेनदेन स्वीकृत कराने, पहचान सत्यापन प्रक्रियाओं को प्रभावित करने और वित्तीय जानकारी हासिल करने के लिए किया जा सकता है।

बैंकिंग क्षेत्र के निर्णयकर्ताओं ने माना कि धोखाधड़ी की बढ़ती घटनाओं के कारण वित्तीय नुकसान के अलावा प्रतिष्ठा संबंधी जोखिम भी बढ़े हैं। किसी बड़े साइबर हमले या धोखाधड़ी की घटना से ग्राहकों का भरोसा प्रभावित हो सकता है, जिसका असर लंबे समय तक संस्थानों की साख पर पड़ सकता है। यही कारण है कि कई बैंक अब सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त निवेश की योजना बना रहे हैं।

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रिपोर्ट के अनुसार भारतीय बैंक उन्नत पहचान सत्यापन प्रणाली, व्यवहार विश्लेषण, रीयल-टाइम फ्रॉड मॉनिटरिंग और AI आधारित जोखिम मूल्यांकन तकनीकों को तेजी से अपनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। बैंकिंग संस्थानों का मानना है कि आधुनिक साइबर खतरों से निपटने के लिए पारंपरिक सुरक्षा उपाय अब पर्याप्त नहीं हैं और अधिक बुद्धिमान सुरक्षा प्रणालियों की आवश्यकता है।

एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी सामने आया कि अधिकांश बैंकिंग अधिकारी नियामकीय अनुपालन और डेटा सुरक्षा को लेकर पहले से अधिक सतर्क हो गए हैं। वित्तीय क्षेत्र में बढ़ती डिजिटल निर्भरता के कारण संवेदनशील ग्राहक डेटा की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल हो गई है। बैंक इस दिशा में कर्मचारी प्रशिक्षण, साइबर जागरूकता कार्यक्रम और बहु-स्तरीय प्रमाणीकरण उपायों को मजबूत कर रहे हैं।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि AI तकनीक जहां वित्तीय सेवाओं को अधिक कुशल बना रही है, वहीं साइबर अपराधी भी इसी तकनीक का उपयोग करके लोगों को धोखा देने के नए तरीके विकसित कर रहे हैं। उनके अनुसार सोशल इंजीनियरिंग, डीपफेक कॉल और फर्जी डिजिटल पहचान आने वाले समय में साइबर अपराध का बड़ा माध्यम बन सकते हैं, इसलिए बैंकों और ग्राहकों दोनों को अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।

रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारत का बैंकिंग क्षेत्र तकनीकी नवाचार और साइबर सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का सामना कर रहा है। डिजिटल बैंकिंग के विस्तार के साथ AI-संचालित धोखाधड़ी के जोखिम भी बढ़ रहे हैं, जिसके चलते वित्तीय संस्थान सुरक्षा प्रणालियों को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में तेजी से कदम उठा रहे हैं। आने वाले वर्षों में बैंकिंग क्षेत्र की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि वह उभरते साइबर खतरों का मुकाबला कितनी प्रभावी रणनीति और तकनीक के साथ कर पाता है।

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