नई दिल्ली: डिजिटल लेनदेन के बढ़ते दायरे के साथ साइबर ठगी के नेटवर्क पर शिकंजा कसने के लिए सरकार ने वित्तीय संस्थानों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था को मजबूत किया है। भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की Suspect Registry इस रणनीति का अहम हिस्सा बनकर सामने आई है। इस व्यवस्था के जरिए साइबर अपराध से जुड़े या संदिग्ध बैंक खातों, मोबाइल नंबरों, ई-मेल पते, डिजिटल पहचान और उपकरणों की जानकारी वित्तीय संस्थानों के साथ साझा की जा रही है, ताकि धोखाधड़ी की रकम को आगे बढ़ने से पहले ही रोका जा सके।
I4C ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों के सहयोग से 10 सितंबर 2024 को Suspect Registry शुरू की थी। इसका उद्देश्य ऐसे डिजिटल पहचानकर्ताओं की पहचान करना है, जिनका इस्तेमाल साइबर अपराध में किया जा रहा है या जिनके धोखाधड़ी से जुड़े होने का संदेह है। 30 जून 2026 तक बैंकों और वित्तीय संस्थानों की ओर से 30.48 लाख से अधिक संदिग्ध पहचानकर्ताओं की जानकारी इस रजिस्ट्री में दर्ज की जा चुकी थी।
इसी अवधि में 32.08 लाख Layer-1 mule accounts की पहचान कर उनकी जानकारी भी साझा की गई। Mule accounts ऐसे बैंक खाते होते हैं, जिनका इस्तेमाल साइबर अपराधी ठगी से हासिल रकम प्राप्त करने, दूसरे खातों में भेजने या धन को कई स्तरों पर घुमाने के लिए करते हैं। कई मामलों में खाताधारकों को कमीशन या अन्य लाभ का लालच देकर उनके बैंक खातों का इस्तेमाल कराया जाता है।
साइबर अपराधियों के लिए ठगी की रकम को तेजी से कई खातों में भेजना आम रणनीति है। पीड़ित के खाते से पैसा निकलने के बाद कुछ ही समय में वह कई बैंक खातों से होकर गुजर सकता है। इस प्रक्रिया को layering कहा जाता है। इससे मूल स्रोत और रकम के अंतिम लाभार्थी तक पहुंचना जांच एजेंसियों के लिए मुश्किल हो जाता है। Suspect Registry का उद्देश्य इसी श्रृंखला की शुरुआती कड़ियों को पहचानकर वित्तीय प्रवाह को रोकना है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 30 जून 2026 तक Suspect Registry से जुड़ी रोकथाम व्यवस्था के जरिए करीब ₹25,698 करोड़ की संदिग्ध या संभावित धोखाधड़ी वाली रकम के लेनदेन को रोका गया। यह व्यवस्था साइबर अपराध की जांच पूरी होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय ठगी की रकम को शुरुआत में ही रोकने की दिशा में बदलाव को दर्शाती है।
साइबर ठगी में इस्तेमाल होने वाले मोबाइल नंबर और उपकरण भी निगरानी के दायरे में हैं। सरकार ने साइबर अपराध से जुड़े 15.75 लाख SIM कार्ड और 5.77 लाख IMEI ब्लॉक किए हैं। IMEI मोबाइल उपकरण की विशिष्ट पहचान संख्या होती है। किसी अपराध से जुड़े उपकरण का IMEI ब्लॉक किए जाने के बाद उसे मोबाइल नेटवर्क पर दोबारा इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाता है।
साइबर अपराधियों की रणनीतियां भी लगातार बदल रही हैं। फर्जी वेबसाइट, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मैसेजिंग एप्लिकेशन और डिजिटल पहचान का इस्तेमाल कर लोगों को निवेश, नौकरी, बैंक KYC, बिजली बिल, पार्सल डिलीवरी और डिजिटल अरेस्ट जैसे अलग-अलग तरीकों से निशाना बनाया जा रहा है। Social engineering के जरिए पीड़ितों को मनोवैज्ञानिक दबाव में लेकर गोपनीय जानकारी साझा कराने या खुद रकम ट्रांसफर करने के लिए भी मजबूर किया जाता है।
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, साइबर ठगी के मामलों में केवल अपराधी की पहचान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि रकम के प्रवाह को शुरुआती स्तर पर रोकना भी जरूरी है। संदिग्ध खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल उपकरणों की रियल-टाइम पहचान से मनी ट्रेल को लंबा होने से पहले बाधित किया जा सकता है। बैंकिंग रिकॉर्ड, डिजिटल लॉग और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के बीच त्वरित समन्वय जांच की प्रभावशीलता बढ़ा सकता है।
साइबर अपराध की एक बड़ी चुनौती यह भी है कि अपराधी एक राज्य में बैठकर दूसरे राज्य के व्यक्ति को निशाना बनाते हैं और रकम कई राज्यों के खातों में भेज देते हैं। ऐसे मामलों में बैंकों, वित्तीय संस्थानों और पुलिस एजेंसियों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर सूचना साझा करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
I4C की Suspect Registry इसी समन्वय को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। हालांकि, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, फर्जी डिजिटल पहचान और नए सामाजिक इंजीनियरिंग तरीकों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच साइबर अपराधियों की रणनीति लगातार बदल रही है। ऐसे में संदिग्ध गतिविधियों की तेज पहचान, वित्तीय संस्थानों की तत्काल प्रतिक्रिया और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय ही साइबर ठगी के खिलाफ इस रोकथाम तंत्र को प्रभावी बनाए रखने की कुंजी होगी।
