हिमाचल प्रदेश में साइबर अपराध के मामलों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वर्ष 2025 में राज्य में कुल 18,706 शिकायतें दर्ज हुईं, जो 2024 के 12,249 मामलों की तुलना में करीब 52 प्रतिशत अधिक हैं। 2023 में यह संख्या 8,077 थी, जिससे स्पष्ट है कि डिजिटल ठगी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और राज्य में साइबर अपराध एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह वृद्धि राष्ट्रीय स्तर पर तेजी से फैल रहे संगठित साइबर अपराध के रुझान का हिस्सा है। इस वर्ष दर्ज मामलों में एआई-जनित फिशिंग ईमेल, ऊंचे रिटर्न का झांसा देने वाले फर्जी निवेश प्लेटफॉर्म, वर्क-फ्रॉम-होम और जॉब स्कैम, व्हाट्सऐप व टेलीग्राम के जरिए ठगी, यूपीआई और क्यूआर कोड फ्रॉड, ओटीपी चोरी, बैंक खाते हैकिंग और सोशल मीडिया इम्पर्सनेशन जैसे अपराध प्रमुख रूप से सामने आए हैं।
Certified Cyber Crime Investigator Course Launched by Centre for Police Technology
अधिकारियों का कहना है कि साइबर अपराध अब व्यक्तिगत हैकिंग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका है। अपराधी अवैध ऑनलाइन मार्केटप्लेस से चोरी किए गए डेटा, बैंकिंग क्रेडेंशियल और पहचान दस्तावेज खरीदते हैं और ‘क्राइम-एज-ए-सर्विस’ मॉडल के तहत ठगी के टूल किराए पर लेकर बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी करते हैं। इस नेटवर्क की अंतरराष्ट्रीय प्रकृति के कारण जांच और अभियोजन और अधिक जटिल हो गया है।
जांच एजेंसियों ने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दुरुपयोग ने खतरे को और बढ़ा दिया है। अब ठग नकली आवाज तैयार कर सकते हैं, चेहरे की क्लोनिंग कर सकते हैं और बेहद वास्तविक दिखने वाले संदेश भेज सकते हैं, जिससे पीड़ित आसानी से विश्वास कर लेते हैं। अधिकांश मामलों में तकनीकी सिस्टम तोड़े नहीं जाते, बल्कि लोगों की मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का फायदा उठाया जाता है, जिसे सोशल इंजीनियरिंग कहा जाता है।
बढ़ते खतरे को देखते हुए हिमाचल पुलिस ने अपनी साइबर प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत किया है। सभी जिलों में समर्पित साइबर क्राइम थाने और विशेष साइबर सेल स्थापित किए गए हैं। राज्य की प्रणाली को भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) से जोड़ा गया है, जिससे सूचना साझा करने और त्वरित कार्रवाई में मदद मिल रही है।
पुलिस 1930 साइबर फ्रॉड हेल्पलाइन के प्रचार पर विशेष जोर दे रही है, ताकि पीड़ित तुरंत शिकायत दर्ज करा सकें और संदिग्ध लेनदेन को समय रहते फ्रीज किया जा सके। अधिकारियों के अनुसार, शुरुआती कुछ घंटों में सूचना मिलने पर रकम रिकवर होने की संभावना अधिक रहती है।
साइबर अपराध से निपटने के लिए पुलिस कर्मियों को डिजिटल फॉरेंसिक, वित्तीय जांच और डेटा विश्लेषण का विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बैंकों के साथ समन्वय बढ़ाया गया है, ताकि संदिग्ध खातों और ट्रांजेक्शन को तुरंत रोका जा सके। स्कूलों, कॉलेजों और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को नए प्रकार के साइबर फ्रॉड के बारे में बताया जा रहा है।
पुलिस ने नागरिकों को सलाह दी है कि वे किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करें, ओटीपी, पिन या पासवर्ड किसी के साथ साझा न करें और तत्काल भुगतान के अनुरोध को सत्यापित किए बिना पैसा ट्रांसफर न करें। सभी ऑनलाइन खातों में टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन सक्षम करने, सॉफ्टवेयर अपडेट रखने और अलग-अलग प्लेटफॉर्म के लिए मजबूत पासवर्ड उपयोग करने की भी सलाह दी गई है।
अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल लेनदेन और ऑनलाइन सेवाओं के बढ़ते उपयोग के साथ साइबर सुरक्षा को व्यक्तिगत स्तर पर अपनाना जरूरी हो गया है। बढ़ती शिकायतें इस बात का संकेत हैं कि तकनीक के विस्तार के साथ अपराध के नए तरीके सामने आ रहे हैं और इनके मुकाबले के लिए कानून प्रवर्तन, वित्तीय संस्थानों और आम जनता के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।
साइबर अपराधियों के लगातार बदलते तौर-तरीकों को देखते हुए पुलिस ने स्पष्ट किया है कि जागरूकता ही सबसे प्रभावी बचाव है और समय पर रिपोर्टिंग से नुकसान को कम किया जा सकता है।
