साइबर अपराध रोकने के लिए जागरूकता नेटवर्क और AI आधारित निगरानी के साथ राष्ट्रीय अभियान की तैयारी, डिजिटल अरेस्ट जैसे फ्रॉड पर फोकस।

“टेक्नोलॉजी से ठगी पर ब्रेक: हिमाचल ने 10 महीनों में ₹2,300 करोड़ बचाकर बनाया नया रिकॉर्ड”

Roopa
By Roopa
5 Min Read

शिमला। देशभर में तेजी से बढ़ रहे साइबर फ्रॉड के बीच हिमाचल प्रदेश से एक राहत भरी खबर सामने आई है। दूरसंचार विभाग की उन्नत तकनीकी पहल और जोखिम-आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम की मदद से पिछले 10 महीनों में करीब ₹2,300 करोड़ की संभावित ठगी को समय रहते रोक दिया गया। यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है, जब डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन सेवाओं के विस्तार के साथ साइबर अपराध भी तेजी से बढ़ रहे हैं और आम नागरिकों के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं।

दूरसंचार विभाग के प्रदेश लाइसेंस सेवा क्षेत्र शिमला के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, इस सफलता के पीछे “फाइनेंशियल फ्रॉड रिस्क इंडिकेटर” (FRI) नामक एक उन्नत प्रणाली की अहम भूमिका रही है। यह सिस्टम मोबाइल नंबरों, कॉल पैटर्न और डिजिटल गतिविधियों का विश्लेषण कर उन्हें जोखिम के आधार पर मध्यम, उच्च और अत्यधिक उच्च श्रेणियों में वर्गीकृत करता है। इस वर्गीकरण के आधार पर बैंक, यूपीआई प्लेटफॉर्म और अन्य वित्तीय संस्थान संदिग्ध ट्रांजेक्शन की पहचान कर तुरंत कार्रवाई कर पाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि FRI सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत इसकी रियल-टाइम मॉनिटरिंग क्षमता है। जैसे ही कोई मोबाइल नंबर या ट्रांजेक्शन संदिग्ध श्रेणी में आता है, तुरंत अलर्ट जारी हो जाता है। इससे कई मामलों में पैसा ट्रांसफर होने से पहले ही रोक दिया जाता है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में संभावित धोखाधड़ी को शुरुआती स्तर पर ही ब्लॉक किया जा सका और लोगों की मेहनत की कमाई सुरक्षित रह पाई।

इसके साथ ही “संचार साथी” पोर्टल और मोबाइल ऐप भी इस लड़ाई में एक प्रभावी हथियार बनकर उभरा है। यह प्लेटफॉर्म आम नागरिकों को डिजिटल सुरक्षा के लिए कई सुविधाएं देता है। इसके जरिए लोग संदिग्ध कॉल और मैसेज की शिकायत दर्ज कर सकते हैं, खोए या चोरी हुए मोबाइल फोन को तुरंत ब्लॉक कर सकते हैं और अपने नाम पर जारी सभी मोबाइल कनेक्शनों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे साइबर अपराधों की रिपोर्टिंग आसान हुई है और लोगों में सतर्कता भी बढ़ी है।

अधिकारियों का मानना है कि इन तकनीकी उपायों ने साइबर सुरक्षा को केवल संस्थागत दायरे से निकालकर आम जनता तक पहुंचाया है। अब उपयोगकर्ता खुद भी संदिग्ध गतिविधियों को पहचानकर समय रहते कार्रवाई कर सकते हैं। यही कारण है कि साइबर अपराध के खिलाफ यह लड़ाई अब ज्यादा प्रभावी और व्यापक बनती जा रही है।

FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference

विभाग ने मोबाइल टावरों से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड (EMF) उत्सर्जन को लेकर भी लोगों की चिंताओं को दूर किया है। अधिकारियों के अनुसार, भारत में इसके मानक अंतरराष्ट्रीय मानकों से भी अधिक सख्त हैं और नियमित परीक्षण के जरिए इनका अनुपालन सुनिश्चित किया जाता है। इससे मोबाइल नेटवर्क के विस्तार के बावजूद स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को नियंत्रित रखा गया है।

हिमाचल प्रदेश में डिजिटल कनेक्टिविटी का विस्तार भी तेजी से हो रहा है। फोर-जी संतृप्ति और संशोधित भारत नेट परियोजना के तहत प्रदेश में अब तक 565 से अधिक 4G साइट्स स्थापित की जा चुकी हैं। इसके अलावा 3,600 से अधिक ग्राम पंचायतों तक ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क बिछाने का कार्य जारी है, जिनमें से सैकड़ों पंचायतें पहले ही हाई-स्पीड इंटरनेट से जुड़ चुकी हैं। इससे दूरदराज के इलाकों में भी डिजिटल सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित हो रही है।

“संचार मित्र” योजना के तहत आईआईटी, एनआईटी और अन्य तकनीकी संस्थानों के छात्रों को भी इस पहल से जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य युवाओं को साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूक करना और उन्हें डिजिटल सुरक्षा के क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना है। यह पहल आने वाले समय में साइबर सुरक्षा के मजबूत इकोसिस्टम के निर्माण में अहम भूमिका निभा सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि हिमाचल का यह मॉडल देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है। जहां साइबर अपराधी लगातार नई तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं इस तरह के प्रिवेंटिव और रियल-टाइम सिस्टम आधारित उपाय ही उन्हें प्रभावी तरीके से रोक सकते हैं।

डिजिटल युग में जहां हर लेनदेन तेजी से ऑनलाइन हो रहा है, वहां सुरक्षा को लेकर ऐसी पहलें बेहद जरूरी हो गई हैं। हिमाचल प्रदेश ने यह साबित किया है कि सही तकनीक, मजबूत निगरानी तंत्र और जागरूकता के जरिए साइबर ठगी जैसे जटिल खतरे को भी काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

हमसे जुड़ें

Share This Article