फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्रों के एक बड़े नेटवर्क की जांच कर रही एसआईटी को महत्वपूर्ण सफलता मिली है। जांच में सामने आया है कि फरीदाबाद की लिंग्या यूनिवर्सिटी और हापुड़ की मोनाड यूनिवर्सिटी से संबंधित कुल 103 डिग्रियां फर्जी पाई गई हैं। दोनों विश्वविद्यालय प्रबंधन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि बरामद प्रमाणपत्र उनके संस्थानों द्वारा जारी नहीं किए गए थे।
एसआईटी की छापेमारी और जांच
एसआईटी की पांच टीमों ने हाल ही में फरीदाबाद, हापुड़, अलीगढ़, सहारनपुर और फिरोजाबाद स्थित पांच विश्वविद्यालयों में छापेमारी और जांच अभियान चलाया था। प्रारंभिक पड़ताल में लिंग्या यूनिवर्सिटी से जुड़ी 100 और मोनाड यूनिवर्सिटी से जुड़ी 3 डिग्रियां संदिग्ध पाई गईं। जांच के दौरान दोनों संस्थानों के अधिकारियों ने लिखित रूप से यह जानकारी दी कि इन डिग्रियों का उनके आधिकारिक रिकॉर्ड से कोई संबंध नहीं है।
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गिरोह के मास्टरमाइंड और गिरफ्तारियां
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, फर्जी डिग्री नेटवर्क के तार शैल ग्रुप ऑफ एजुकेशन नामक संस्था से जुड़े पाए गए हैं। किदवई नगर पुलिस ने इसी संस्थान पर छापा मारकर चार युवकों को गिरफ्तार किया था, जिनके पास से 9 राज्यों की 15 अलग-अलग यूनिवर्सिटियों से जुड़े 900 से अधिक शैक्षिक प्रमाणपत्र, माइग्रेशन और मार्कशीट बरामद हुई थीं। इनमें कानपुर की छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) की 357 फर्जी डिग्रियां भी शामिल थीं।
जांच एजेंसियों के मुताबिक इस पूरे गिरोह का संचालन शैलेंद्र कुमार ओझा नाम का व्यक्ति करता था, जिसे नेटवर्क का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है। गिरोह से जुड़े अन्य संदिग्धों में नागेश मणि त्रिपाठी, जोगेंद्र और अश्वनी कुमार सिंह को पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। इसके अलावा छतरपुर के मयंक भारद्वाज, हैदराबाद के मनीष उर्फ रवि, गाजियाबाद के विनीत, भोपाल के शेखू और शुभम दुबे की तलाश अभी जारी है।
वित्तीय ट्रांजेक्शन और अन्य खुलासे
एसआईटी जांच में यह भी सामने आया है कि शैल ग्रुप ऑफ एजुकेशन के नाम से संचालित बैंक खाते में पिछले पांच वर्षों के दौरान लगभग ₹7 करोड़ का ट्रांजेक्शन हुआ है। वर्ष 2021 से 2025 के बीच इस खाते से बड़ी रकम के लेनदेन दर्ज किए गए हैं। जांच अधिकारी अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह धनराशि किन स्रोतों से आई और किन खातों में ट्रांसफर की गई।
गिरोह के सदस्य कथित तौर पर मेडिकल, तकनीकी और अन्य शैक्षिक क्षेत्रों में फर्जी प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने का दावा करते थे। पुलिस का मानना है कि यह नेटवर्क बेरोजगार युवाओं और नौकरी की तलाश करने वालों को निशाना बनाता था। फर्जी डिग्री के आधार पर नौकरी पाने की कोशिश करने वाले कई मामलों की भी जांच की जा रही है।
जांच में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है कि आरोपी गिरोह ने नौबस्ता क्षेत्र में एक महिला से 11 महीने के एग्रीमेंट पर दुकान किराये पर ली थी। इसी स्थान पर वर्धमान इंडस्ट्रीज नाम का बोर्ड लगाया गया और बाद में कंपनी के नाम पर जीएसटी पंजीकरण कराया गया। अधिकारियों को संदेह है कि इस पते का उपयोग वित्तीय लेनदेन को छिपाने के लिए किया गया था।
जीएसटी विभाग के अधिकारियों ने बताया कि पैन और आधार दस्तावेजों के आधार पर जीएसटी नंबर जारी किया गया था, लेकिन भौतिक सत्यापन किस स्तर पर किया गया, इसका स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। क्राइम ब्रांच अब इस प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और दस्तावेजों की भी जांच कर रही है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी स्पष्ट कर दिया है कि फर्जी डिग्री जारी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। पुलिस और एसआईटी की टीमें गिरोह के अन्य सदस्यों और वित्तीय नेटवर्क का पता लगाने के लिए लगातार छापेमारी और तकनीकी जांच कर रही हैं।
फिलहाल मामला गंभीर स्तर की धोखाधड़ी से जुड़ा माना जा रहा है और जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क को उजागर करने के लिए विस्तृत कार्रवाई कर रही हैं।
