कार लोन पूरी तरह चुकाने और NOC मिलने के बाद भी खाते से EMI काटने की कोशिश जारी रही; बार-बार की गई वसूली कार्रवाई से परेशान ग्राहक को मिला न्याय, बैंक को मुआवजा और CIBIL रिकॉर्ड सुधारने का आदेश

₹590 की गलत पेनल्टी SBI को पड़ी भारी: बंद हो चुके कार लोन पर EMI वसूली की कोशिश, उपभोक्ता आयोग ने ठोका ₹1.10 लाख का हर्जाना

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By Roopa
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चंडीगढ़/पंजाब। एक बंद हो चुके कार लोन पर महज ₹590 की पेनल्टी वसूलने की कोशिश आखिरकार देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक को महंगी पड़ गई। पंजाब के एक उपभोक्ता विवाद मामले में जिला उपभोक्ता आयोग ने पाया कि लोन पूरी तरह चुकाए जाने और बैंक द्वारा नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी किए जाने के बावजूद ग्राहक के खाते से EMI वसूली की कोशिशें जारी रहीं। आयोग ने इसे सेवा में गंभीर कमी, लापरवाही और अनुचित व्यापार व्यवहार मानते हुए बैंक को ₹1 लाख का मुआवजा, ₹10,000 मुकदमा खर्च तथा ₹590 की वसूली गई राशि लौटाने का आदेश दिया है।

मामला पंजाब निवासी संजीव कुमार नैय्यर से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 2021 में ₹2 लाख का कार लोन लिया था। इस ऋण के तहत उन्हें हर महीने ₹4,100 की EMI चुकानी थी। रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने पूरे लोन की रकम समय पर अदा की और 10 नवंबर 2025 को शेष बकाया का भुगतान कर ऋण खाता पूरी तरह बंद करा दिया। बैंक ने उसी दिन उन्हें विधिवत हस्ताक्षरित और मुहरयुक्त NOC भी जारी कर दी थी।

हालांकि लोन बंद होने के बाद भी परेशानी खत्म नहीं हुई। शिकायतकर्ता के अनुसार दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में बैंक ने उनके खाते से फिर EMI वसूलने की कोशिश की। दोनों अवसरों पर आपत्ति दर्ज कराने के बाद रकम वापस कर दी गई और आश्वासन दिया गया कि भविष्य में ऐसी गलती नहीं होगी। लेकिन इसके बावजूद समस्या जारी रही।

20 जनवरी 2026 को बैंक ने एक बार फिर नेशनल ऑटोमेटेड क्लियरिंग हाउस (NACH) के माध्यम से EMI वसूली का प्रयास किया। उस समय खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण ट्रांजेक्शन असफल हो गया और शिकायतकर्ता के खाते पर ₹590 का बाउंस चार्ज लगा दिया गया। लोन पहले ही बंद हो चुका था, इसलिए ग्राहक ने इसे बैंक की स्पष्ट लापरवाही बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई।

शिकायतकर्ता ने फरवरी 2026 में बैंक को कानूनी नोटिस भेजकर ₹590 की वापसी और मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवजे की मांग की। आरोप है कि नोटिस का भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। इसके बाद मामला जिला उपभोक्ता आयोग के समक्ष पहुंचा।

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आयोग ने सुनवाई के दौरान उपलब्ध दस्तावेजों, बैंक स्टेटमेंट और रिकॉर्ड का परीक्षण किया। आयोग ने पाया कि नवंबर 2025 में ऋण खाता पूरी तरह बंद हो चुका था और उसके बाद EMI वसूली के लिए बार-बार NACH प्रस्तुत करना बैंक की लापरवाही को दर्शाता है। आयोग ने कहा कि ऐसी कार्रवाई के कारण शिकायतकर्ता को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मानसिक तनाव, असुविधा और समय की बर्बादी का सामना करना पड़ा।

अपने आदेश में आयोग ने उल्लेख किया कि बंद लोन खाते पर बार-बार वसूली प्रयासों के कारण ट्रांजेक्शन अस्वीकृत हुआ और ग्राहक पर ₹590 का अतिरिक्त शुल्क लगा। इसके अलावा ग्राहक को अपने CIBIL स्कोर पर संभावित नकारात्मक प्रभाव की भी चिंता बनी रही। आयोग ने माना कि बैंक की उदासीनता और लापरवाह रवैये ने शिकायतकर्ता को अनावश्यक रूप से परेशान किया।

आयोग ने यह भी कहा कि एक सेवा प्रदाता के रूप में बैंक की कानूनी जिम्मेदारी थी कि वह ग्राहक के हितों की रक्षा करे और ऋण बंद होने के बाद संबंधित प्रक्रियाओं को सही ढंग से अपडेट करे। ऐसा न करना सेवा में कमी की श्रेणी में आता है। आदेश में कहा गया कि शिकायतकर्ता को हुई मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न, असुविधा और वित्तीय नुकसान के लिए उचित मुआवजा दिया जाना आवश्यक है।

इसी आधार पर आयोग ने बैंक को निर्देश दिया कि वह 45 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता को ₹1 लाख मुआवजा, ₹10,000 मुकदमा खर्च तथा ₹590 बाउंस चार्ज की राशि वापस करे। साथ ही यदि गलत वसूली प्रयासों के कारण ग्राहक के CIBIL रिकॉर्ड पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो तो उसे भी तत्काल सुधारने के आदेश दिए गए हैं।

यह फैसला बैंकिंग सेवाओं में जवाबदेही और उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आदेश यह स्पष्ट संदेश देता है कि ऋण बंद होने के बाद भी ग्राहकों को अनावश्यक परेशान करने वाली प्रक्रियात्मक लापरवाही वित्तीय संस्थानों के लिए महंगी साबित हो सकती है।

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