नई दिल्ली: बहुचर्चित रेल नीर घोटाले से जुड़ी एक अहम प्रशासनिक परत अब सामने आई है, जहां सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी को रोकने पर केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन (IRCTC) को फटकार लगाते हुए स्पष्ट कहा कि सूचना देने से इनकार करते समय ठोस और तर्कसंगत कारण देना अनिवार्य है, केवल नियमों का हवाला देना पर्याप्त नहीं।
मामला उस RTI आवेदन से जुड़ा है, जिसमें यह जानकारी मांगी गई थी कि रेलवे के टेंडर में हिस्सा लेने वाली कंपनियों ने क्या अपने ऊपर दर्ज मामलों—खासतौर पर 2015 के रेल नीर घोटाले—का खुलासा किया था या नहीं। आवेदन में यह भी पूछा गया था कि क्या इन कंपनियों ने अपने खिलाफ दर्ज CBI और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मामलों, छापेमारी, जब्ती या चार्जशीट जैसी कार्रवाइयों की जानकारी टेंडर प्रक्रिया के दौरान साझा की थी।
आवेदनकर्ता ने विशेष रूप से यह जानना चाहा था कि क्या बोली लगाने वाली कंपनियों ने यह घोषित किया कि वे “प्रसिद्ध रेल नीर घोटाले” में आरोपी हैं, और क्या उनके खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा दर्ज FIR (RC-DAI-2015-A-0032) का उल्लेख किया गया था। साथ ही यह भी पूछा गया था कि क्या ED द्वारा IPC की धारा 120B, 420 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत दर्ज मामलों का खुलासा किया गया था।
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हालांकि, IRCTC ने इस जानकारी को साझा करने से इनकार करते हुए RTI अधिनियम की धारा 8(1)(d) का हवाला दिया, जो ‘व्यावसायिक गोपनीयता और व्यापारिक रहस्यों’ से संबंधित है। जवाब में यह कहा गया कि जानकारी देने से कंपनियों के वाणिज्यिक हित प्रभावित हो सकते हैं, इसलिए इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने भी इसी तर्क को बरकरार रखा।
लेकिन CIC ने इस जवाब को ‘यांत्रिक और अधूरा’ करार देते हुए कड़ी आपत्ति जताई। आयोग ने कहा कि केवल किसी अपवाद धारा का उल्लेख कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वह धारा इस मामले में कैसे लागू होती है। आदेश में कहा गया कि “बिना ठोस कारण बताए केवल अपवाद का हवाला देना RTI कानून के तहत वैध जवाब नहीं माना जा सकता।”
आयोग ने यह भी दोहराया कि किसी भी सूचना को रोकने का भार संबंधित सार्वजनिक प्राधिकरण पर होता है, और उसे यह साबित करना होता है कि जानकारी साझा करने से वास्तविक नुकसान या खतरा हो सकता है। इस मामले में IRCTC ऐसा कोई ठोस आधार प्रस्तुत करने में असफल रहा।
CIC ने IRCTC को निर्देश दिया है कि वह पूरे मामले की दोबारा समीक्षा करे और RTI आवेदन पर ‘स्पष्ट, तर्कसंगत और कारणयुक्त’ जवाब जारी करे। आयोग ने संकेत दिया कि पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब मामला सार्वजनिक धन और सरकारी टेंडर प्रक्रिया से जुड़ा हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश केवल एक मामले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी एजेंसियों के लिए एक व्यापक संदेश है कि वे RTI कानून का पालन गंभीरता से करें। यदि टेंडर प्रक्रिया में शामिल कंपनियों के खिलाफ गंभीर आरोप या जांच लंबित है, तो उसका खुलासा न करना पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत हो सकता है।
रेल नीर घोटाला पहले ही देश में सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग का बड़ा उदाहरण बन चुका है। ऐसे में यह नया घटनाक्रम यह संकेत देता है कि न केवल घोटाले की जांच, बल्कि उससे जुड़े प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक पहलुओं पर भी अब कड़ी निगरानी रखी जा रही है।
आखिरकार, CIC का यह रुख स्पष्ट करता है कि सूचना का अधिकार केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का मजबूत स्तंभ है—और इसके साथ किसी भी तरह की ढिलाई स्वीकार नहीं की जाएगी।
