नाम की स्पेलिंग में महज एक अक्षर के अंतर ने एक महिला को पारिवारिक पेंशन के लिए 45 वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर कर दिया। अंततः हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मामले में राहत की उम्मीद जगी है। अदालत ने प्रशासनिक रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए एक सप्ताह के भीतर प्रकरण का निस्तारण करने का सख्त निर्देश दिया है।
यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकल पीठ ने मंजू राय की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि निर्धारित समयसीमा में आदेश का पालन नहीं हुआ, तो अगली सुनवाई 26 फरवरी 2026 को नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देना होगा।
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एक अक्षर बना बड़ी बाधा
मामले के अनुसार, याची मंजू राय के पिता नगर निगम कानपुर में कर्मचारी थे। वे वर्ष 1975 में सेवानिवृत्त हुए और 1980 में उनका निधन हो गया। सेवाकाल के दौरान तथा सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें नियमित पेंशन मिलती रही। लेकिन मृत्यु के बाद जब परिवार ने फैमिली पेंशन के लिए आवेदन किया, तो विभागीय रिकॉर्ड में नाम की स्पेलिंग को लेकर आपत्ति उठा दी गई।
सेवा पुस्तिका में उनका नाम ‘शिखर नाथ शुक्ला’ दर्ज था, जबकि आवेदन पत्र और कुछ अन्य दस्तावेजों में ‘शेखर नाथ शुक्ला’ लिखा गया था। अंग्रेजी वर्तनी में ‘I’ और ‘E’ के अंतर को आधार बनाकर विभाग ने यह मानने से इनकार कर दिया कि दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं। इसी आधार पर पारिवारिक पेंशन की फाइल वर्षों तक लंबित रखी गई।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
याची की ओर से अधिवक्ता विनय शर्मा ने अदालत में दलील दी कि नाम की यह त्रुटि महज टंकण संबंधी है और इससे व्यक्ति की पहचान पर कोई संदेह नहीं बनता। याची ने अपने दावे के समर्थन में शपथपत्र, सक्सेशन सर्टिफिकेट तथा अन्य प्रमाणित दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिनसे स्पष्ट हुआ कि दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने प्रशासनिक रवैये पर तीखी टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि जब याचिकाकर्ता ने पर्याप्त और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत कर दिए हैं, तब मात्र एक अक्षर के अंतर को आधार बनाकर दशकों तक पेंशन रोके रखना न केवल अनुचित है, बल्कि नागरिक अधिकारों के साथ अन्याय भी है।
एक सप्ताह की मोहलत
अदालत ने नगर निगम कानपुर के अधिकारियों को निर्देश दिया कि एक सप्ताह के भीतर मामले का निस्तारण कर उचित आदेश पारित करें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि आदेश की अवहेलना की स्थिति में नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा।
प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल
यह मामला सरकारी अभिलेखों में त्रुटियों और उनके सुधार में लापरवाही को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी या टंकण संबंधी छोटी-छोटी गलतियों को सुधारने के लिए स्पष्ट और समयबद्ध प्रक्रिया होनी चाहिए, ताकि नागरिकों को वर्षों तक न्याय के लिए भटकना न पड़े।
मंजू राय का मामला इस बात का उदाहरण बन गया है कि किस तरह एक मामूली वर्तनी अंतर ने परिवार को चार दशक से अधिक समय तक आर्थिक अधिकार से वंचित रखा। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अदालत के आदेश के बाद प्रशासन कितनी शीघ्रता से कार्रवाई करता है और क्या लंबे समय से लंबित पारिवारिक पेंशन का भुगतान सुनिश्चित किया जाता है।
