नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने दफ्तरों में काम करने का तरीका तेजी से बदल दिया है। रिपोर्ट तैयार करने से लेकर डेटा विश्लेषण, ईमेल लिखने और दूसरे जटिल कार्यों तक में AI कर्मचारियों का समय बचा रहा है। हालांकि, इसके साथ एक नई चुनौती भी सामने आई है। कर्मचारी अब AI से काम कराने के बाद उसके जवाबों की जांच, गलतियों की पहचान और सुधार में लंबा समय लगा रहे हैं। इसी स्थिति को ‘Botsitting’ के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें कर्मचारी AI के तैयार किए गए काम की लगातार निगरानी करते हैं।
अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के करीब 6,000 डिजिटल कर्मचारियों पर किए गए एक सर्वे के अनुसार, लगभग 87 फीसदी कर्मचारी रोजमर्रा के काम में AI का इस्तेमाल कर रहे हैं। करीब 75 फीसदी कर्मचारियों का मानना है कि AI ने उनकी कार्यक्षमता बढ़ाई है। रिपोर्ट के मुताबिक, AI की मदद से कर्मचारियों को हर सप्ताह औसतन 11 घंटे की बचत होती है। लेकिन बचाए गए समय का एक बड़ा हिस्सा AI के काम को जांचने और सुधारने में ही खर्च हो रहा है। औसतन 6.4 घंटे केवल AI के आउटपुट की समीक्षा में चले जाते हैं।
काम की रफ्तार बढ़ी, लेकिन निगरानी का दबाव भी बढ़ा
AI तेजी से कंटेंट तैयार कर सकता है, डेटा व्यवस्थित कर सकता है और कई कार्यों को कुछ सेकंड में पूरा कर सकता है। समस्या तब पैदा होती है जब उसके जवाब में तथ्यात्मक, तकनीकी या संदर्भ संबंधी गलती रह जाती है। मशीन खुद यह तय नहीं कर सकती कि उसके तैयार किए गए हर तथ्य या निष्कर्ष की विश्वसनीयता कितनी है।
ऐसे में कर्मचारी को AI के प्रत्येक महत्वपूर्ण आउटपुट की जांच करनी पड़ती है। लगातार स्क्रीन पर नजर रखना, छोटी-छोटी गलतियां पकड़ना और फिर उन्हें ठीक करना मानसिक रूप से थकाने वाला काम बन रहा है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार सतर्क रहने की यह स्थिति कर्मचारियों में मानसिक थकान और तनाव बढ़ा सकती है।
AI की गलतियां पकड़ना खुद नया काम बन गया
AI से समय बचने की उम्मीद में शुरू किया गया काम कई बार उल्टा अतिरिक्त जिम्मेदारी पैदा कर रहा है। कर्मचारी को पहले AI से काम कराना पड़ता है और उसके बाद उसी काम की गुणवत्ता जांचनी पड़ती है। यदि गलती गंभीर हो तो उसे दोबारा तैयार करना पड़ता है।
इस प्रक्रिया में कर्मचारी AI पर जरूरत से ज्यादा निर्भर भी हो सकते हैं। लगातार AI के जवाबों की समीक्षा से थकने के बाद कुछ कर्मचारी बिना पर्याप्त जांच के उसके आउटपुट को सही मानने का शॉर्टकट अपना सकते हैं। इससे गलत जानकारी आगे बढ़ने और उसके आधार पर गलत निर्णय लिए जाने का जोखिम बढ़ जाता है।
सोचने और निर्णय लेने की क्षमता पर असर
AI पर बढ़ती निर्भरता का एक दूसरा असर कर्मचारियों की स्वतंत्र सोच और निर्णय क्षमता पर पड़ सकता है। यदि हर समस्या का शुरुआती समाधान मशीन से लेने की आदत बन जाए तो कर्मचारी खुद विश्लेषण करने और वैकल्पिक समाधान तलाशने में कम समय दे सकते हैं।
गलत AI आउटपुट की स्थिति में जवाबदेही का सवाल भी महत्वपूर्ण है। मशीन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए अंतिम निर्णय और उसके परिणाम की जिम्मेदारी इंसान पर ही रहती है। यही कारण है कि संवेदनशील कार्यों में AI के इस्तेमाल के साथ मानवीय निगरानी जरूरी बनी हुई है।
बार-बार प्रॉम्प्ट से पर्यावरणीय दबाव
AI के लगातार इस्तेमाल का असर केवल कर्मचारियों के समय तक सीमित नहीं है। बार-बार नए सवाल पूछने, प्रॉम्प्ट बदलने और एक ही काम को कई बार करवाने में कंप्यूटिंग संसाधनों और ऊर्जा की खपत बढ़ती है। ऐसे में AI की उत्पादकता का आकलन केवल बचाए गए घंटों से नहीं, बल्कि उसे इस्तेमाल करने में लगने वाले अतिरिक्त समय और संसाधनों से भी किया जाना जरूरी है।
इंसानी समझ और AI के बीच संतुलन जरूरी
AI को कार्यस्थल पर समय बचाने वाला प्रभावी उपकरण बनाने के लिए स्पष्ट इस्तेमाल की गाइडलाइन जरूरी है। हर काम पूरी तरह मशीन पर छोड़ने के बजाय यह तय करना होगा कि किन कार्यों में स्वचालन हो और किन मामलों में अनिवार्य मानवीय जांच की जरूरत है।
आखिरकार AI की रफ्तार तभी वास्तविक उत्पादकता में बदल सकती है, जब उसके साथ इंसानी समझ, निर्णय क्षमता और जवाबदेही का सही संतुलन हो। वरना समय बचाने के लिए अपनाई गई तकनीक कर्मचारियों के लिए एक ऐसा छिपा हुआ कार्यभार बन सकती है, जिसमें AI से काम कराने से ज्यादा समय उसकी गलतियां सुधारने में लगने लगे।
