लखनऊ में सेकंड हैंड कार, एंबुलेंस और बसें दिलाने के नाम पर रकम लेने का आरोप; कोर्ट के आदेश पर RBL बैंक मैनेजर समेत दो के खिलाफ FIR, फर्जी PAN कार्ड के इस्तेमाल का भी दावा

ट्रस्ट को न वाहन मिले, न ₹2.50 करोड़ वापस; बैंक मैनेजर और CEO पर धोखाधड़ी का मुकदमा

Roopa
By Roopa
6 Min Read

लखनऊ: इंदिरानगर सेक्टर-ए स्थित हिंद चैरिटेबल ट्रस्ट से सेकंड हैंड वाहन खरीदने के नाम पर कथित तौर पर ₹2.50 करोड़ की धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। ट्रस्ट की चेयरपर्सन डॉ. ऋचा मिश्रा की शिकायत पर कोर्ट के आदेश के बाद गाजीपुर पुलिस ने RBL बैंक की इंदिरानगर शाखा के मैनेजर मलय मोहन और ट्रस्ट के मेडिकल कॉलेज के CEO वरुण श्रीवास्तव के खिलाफ FIR दर्ज की है। आरोप है कि दोनों ने ट्रस्ट के लिए कार, एंबुलेंस और बसें खरीदकर देने का भरोसा देकर रकम हासिल की, लेकिन बाद में न वाहन उपलब्ध कराए गए और न ही रकम वापस की गई।

शिकायत के अनुसार, मलय मोहन वर्ष 2016 से ट्रस्ट की बैंकिंग गतिविधियों से जुड़ा हुआ था और बैंक संबंधी कामकाज में उसकी भूमिका थी। ट्रस्ट चेयरपर्सन का आरोप है कि मलय के सुझाव पर ही वरुण श्रीवास्तव को ट्रस्ट के मेडिकल कॉलेज का CEO नियुक्त किया गया था। बाद में ट्रस्ट को अपनी संस्थागत और मेडिकल गतिविधियों के लिए सेकंड हैंड वाहनों की जरूरत हुई। इसी दौरान आरोप है कि मलय ने ट्रस्ट को सेकंड हैंड कारों, एंबुलेंस और बसों की खरीद का प्रस्ताव दिया।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, वाहनों की खरीद के लिए करीब ₹2.50 करोड़ की रकम उपलब्ध कराई गई। आरोप है कि रकम मिलने के बाद दोनों ने ट्रस्ट को वाहन उपलब्ध नहीं कराए। कुछ समय तक ट्रस्ट प्रबंधन को वाहन खरीदने की प्रक्रिया चलने का भरोसा दिया जाता रहा। बाद में जब वाहन नहीं मिले और रकम की वापसी भी नहीं हुई तो ट्रस्ट प्रबंधन को कथित वित्तीय अनियमितता का संदेह हुआ।

आरोप यह भी है कि रकम हासिल करने के बाद दोनों ने उसका इस्तेमाल अपने स्तर पर किया और वाहनों का उपयोग भी स्वयं करने लगे। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगी। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ट्रस्ट से ली गई ₹2.50 करोड़ की रकम किन खातों में गई और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया।

मामले में मलय मोहन पर अपने नाम से बने दो कथित फर्जी PAN कार्ड के इस्तेमाल का भी आरोप लगाया गया है। पुलिस इन दस्तावेजों की जांच करेगी और संबंधित रिकॉर्ड से यह पता लगाएगी कि PAN कार्ड कब और किस उद्देश्य से इस्तेमाल किए गए। यदि दस्तावेज फर्जी पाए जाते हैं तो उनके निर्माण, इस्तेमाल और उससे जुड़े लोगों की भूमिका की भी जांच की जाएगी।

डॉ. ऋचा मिश्रा का कहना है कि मामले की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने पुलिस से शिकायत की थी, लेकिन कार्रवाई नहीं होने पर उन्हें अदालत का रुख करना पड़ा। कोर्ट के निर्देश के बाद गाजीपुर पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की है।

पुलिस जांच में ट्रस्ट के बैंक खातों और ₹2.50 करोड़ के लेनदेन का रिकॉर्ड अहम रहेगा। जांचकर्ता भुगतान की तारीख, रकम भेजने वाले और प्राप्त करने वाले खातों, बैंकिंग दस्तावेजों तथा वाहन खरीद से संबंधित रिकॉर्ड की पड़ताल करेंगे। यह भी जांच की जाएगी कि आरोपियों ने वास्तव में किसी विक्रेता या वाहन एजेंसी को कोई भुगतान किया था या नहीं।

इसके अलावा पुलिस ट्रस्ट के पदाधिकारियों, कर्मचारियों और आरोपियों के बीच हुई बातचीत तथा उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की भी जांच कर सकती है। यदि रकम ऑनलाइन बैंकिंग माध्यम से ट्रांसफर हुई है तो बैंक स्टेटमेंट, डिजिटल ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज जांच में महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।

प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, बड़े वित्तीय लेनदेन से जुड़े विवादों में बैंकिंग रिकॉर्ड और डिजिटल ट्रांजेक्शन की कड़ी आरोपों की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि किसी खाते से रकम आगे दूसरे खातों में भेजी गई हो तो मनी ट्रेल के जरिए उसके अंतिम इस्तेमाल और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का पता लगाया जा सकता है।

गाजीपुर पुलिस के अनुसार, शिकायतकर्ता से गबन और कथित धोखाधड़ी से संबंधित दस्तावेज, बैंक खातों का विवरण और अन्य साक्ष्य लिए जाएंगे। इसके बाद आरोपियों से पूछताछ कर उनके बयानों का उपलब्ध रिकॉर्ड से मिलान किया जाएगा। पुलिस यह भी जांच करेगी कि फर्जी PAN कार्ड के इस्तेमाल का आरोप सही है या नहीं।

फिलहाल दोनों आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस का कहना है कि दस्तावेजों, बैंकिंग रिकॉर्ड और पूछताछ से सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि विस्तृत जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

हमसे जुड़ें

Share This Article