प्रयागराज: फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्रों के आधार पर बार काउंसिल में पंजीकरण कराने और उसके बाद वकालत करने के आरोप में प्रयागराज में 26 अधिवक्ताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। मामला सिविल लाइंस थाने से जुड़ा है। यह कार्रवाई बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश की ओर से कराई गई है। जांच में अलग-अलग विश्वविद्यालयों की डिग्री और अंकपत्र सत्यापन के दौरान संदिग्ध पाए गए हैं। संबंधित विश्वविद्यालयों से अभिलेखों की पुष्टि कराने पर भी इन दस्तावेजों की वैधता की पुष्टि नहीं हो सकी।
यह कार्रवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद शुरू हुई जांच का हिस्सा है। ‘कफील बनाम स्टेट ऑफ यूपी व अन्य’ मामले में हाईकोर्ट ने 3 जून 2026 को एक अधिवक्ता की शैक्षणिक डिग्री सत्यापन में फर्जी पाए जाने के बाद प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्देश दिया था। इसके बाद बार काउंसिल ने अपने यहां पंजीकृत अन्य अधिवक्ताओं के शैक्षणिक प्रमाण पत्रों का भी सत्यापन शुरू कराया।
सत्यापन में अलग-अलग विश्वविद्यालयों की डिग्रियां संदिग्ध
जांच के दौरान सामने आया कि कुछ अधिवक्ताओं ने पंजीकरण और सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस (COP) से संबंधित प्रक्रिया में जिन डिग्रियों और अंकपत्रों का इस्तेमाल किया था, उनकी पुष्टि संबंधित विश्वविद्यालयों के रिकॉर्ड से नहीं हो सकी। सत्यापन में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और तमिलनाडु समेत अलग-अलग राज्यों में स्थित विश्वविद्यालयों के नाम सामने आए हैं।
इनमें राजस्थान के पिलानी स्थित श्रीधर विश्वविद्यालय, बरेली के रुहेलखंड विश्वविद्यालय, मेरठ के स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय, गुरुग्राम से जुड़े स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय और तमिलनाडु के तिरुवल्लुवर विश्वविद्यालय सहित अन्य संस्थानों के दस्तावेजों की जांच की गई। बार काउंसिल अब यह पता लगाने में जुटी है कि इन प्रमाण पत्रों को अधिवक्ताओं ने किस माध्यम से हासिल किया और इन्हें पंजीकरण के दौरान कैसे प्रस्तुत किया गया।
लखनऊ के अधिवक्ता का प्रमाण पत्र भी सत्यापन में फर्जी मिला
मामले में लखनऊ निवासी एक अधिवक्ता का उदाहरण भी सामने आया है। बताया गया कि उन्होंने वर्ष 2013 की स्नातक डिग्री और अंकपत्र को COP आवेदन के साथ लगाया था। दस्तावेजों को सत्यापन के लिए पिलानी स्थित श्रीधर विश्वविद्यालय भेजा गया। विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड की जांच में संबंधित अंकपत्र की छायाप्रति को गलत और असत्य बताया गया।
इसके बाद बार काउंसिल की संबंधित समिति की ओर से नोटिस जारी किया गया। दस्तावेजों के सत्यापन और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आगे की कार्रवाई की गई और मामला पुलिस तक पहुंचा। इसी तरह अन्य अधिवक्ताओं के शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच में भी कथित अनियमितताएं सामने आने का दावा किया गया है।
करीब 100 लोगों के खिलाफ दी गई तहरीर
बार काउंसिल की ओर से पुलिस को करीब 100 लोगों के खिलाफ तहरीर दिए जाने की जानकारी है। फिलहाल 26 अधिवक्ताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। बाकी मामलों में दस्तावेजों का सत्यापन और उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच की जा रही है। पुलिस को यदि जांच के दौरान आरोपों की पुष्टि करने वाले पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो अन्य लोगों के खिलाफ भी अलग-अलग मुकदमे दर्ज किए जा सकते हैं।
जांच एजेंसियों के सामने अब केवल फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने वालों की भूमिका स्पष्ट करने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह पता लगाना भी महत्वपूर्ण होगा कि ऐसे प्रमाण पत्र तैयार कहां हुए और उन्हें संबंधित लोगों तक किसने पहुंचाया।
दस्तावेज बनाने वाले नेटवर्क की भी होगी जांच
पुलिस अब डिग्री और अंकपत्र से जुड़े दस्तावेजों की मूल प्रति, सत्यापन रिपोर्ट, विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड, आवेदन पत्र और बार काउंसिल में जमा किए गए कागजात की जांच करेगी। इसके साथ ही यह भी पता लगाया जाएगा कि क्या अलग-अलग मामलों में एक ही व्यक्ति, संस्था या गिरोह की भूमिका रही है।
यदि जांच में फर्जी डिग्री तैयार करने, प्रिंट करने, संशोधित करने या उपलब्ध कराने वाले किसी संगठित नेटवर्क का पता चलता है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है। पुलिस डिजिटल रिकॉर्ड और दस्तावेजों के स्रोत की जांच के जरिए इस पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने का प्रयास करेगी।
बार काउंसिल की ओर से हुई कार्रवाई के बाद यह मामला अब केवल कुछ अधिवक्ताओं के पंजीकरण तक सीमित नहीं रह गया है। करीब 100 लोगों के खिलाफ दी गई तहरीर और लगातार चल रहे दस्तावेज सत्यापन से आने वाले दिनों में मामलों की संख्या बढ़ सकती है। पुलिस का अगला कदम सत्यापन रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपों की पुष्टि करना तथा जिम्मेदार लोगों की भूमिका तय करना होगा।
