मुंबई सत्र अदालत ने ₹58 करोड़ के डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड मामले में कंबोडिया से लौटे आरोपी रियाज़ राजी सय्यद की जमानत याचिका खारिज कर दी

कंबोडिया से लौटे आरोपी को ₹58 करोड़ के ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड केस में जमानत से इनकार, कोर्ट ने कहा—सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता

Team The420
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मुंबई की एक सत्र अदालत ने ₹58 करोड़ के हाई-प्रोफाइल “डिजिटल अरेस्ट” फ्रॉड मामले में कंबोडिया से लौटे आरोपी रियाज़ राजी सय्यद की जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आरोपी की भूमिका स्पष्ट रूप से अलग और गंभीर प्रकृति की है, जिसके चलते उसे अन्य सह-आरोपियों की तुलना में अलग श्रेणी में रखा गया है। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी के व्यवहार, कथित फरार होने और मामले की गंभीरता को देखते हुए सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

यह मामला देश के सबसे बड़े डिजिटल अरेस्ट घोटालों में से एक माना जा रहा है, जिसमें आरोपियों ने एक शहर के व्यवसायी को निशाना बनाकर ₹58 करोड़ की ठगी की। आरोपियों ने खुद को ट्राई (TRAI), सीबीआई और साइबर क्राइम अधिकारियों के रूप में प्रस्तुत कर पीड़ित को डराया और फर्जी जांच का हवाला देकर कई चरणों में धनराशि ट्रांसफर करवाई।

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जांच एजेंसियों के अनुसार, यह पूरा नेटवर्क कई सप्ताह तक सक्रिय रहा और इसमें वीडियो कॉल के जरिए निगरानी, फर्जी नोटिस और लगातार धमकियों का इस्तेमाल किया गया। पीड़ित को यह भी बताया गया कि वह मनी लॉन्ड्रिंग केस में शामिल है, जो कथित तौर पर जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल से जुड़े मामलों से संबंधित है।

अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि रियाज़ राजी सय्यद ने सह-आरोपी रोहित केलकर के साथ मिलकर एक बैंक अकाउंट उपलब्ध कराया, जिसमें ठगी की रकम में से ₹9.85 लाख ट्रांसफर किए गए। इसके बाद यह धनराशि तुरंत निकाली गई। यह भी आरोप लगाया गया कि आरोपी को इस लेनदेन के बदले कमीशन मिला और उसे लगभग ₹5 लाख की अतिरिक्त राशि भी प्राप्त हुई, जिसे उसी दिन कैश में निकाल लिया गया।

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी केस दर्ज होने के बाद फरार हो गया था और उसके खिलाफ लुक आउट सर्कुलर (LOC) जारी किया गया था। बाद में उसे उस समय गिरफ्तार किया गया जब वह कंबोडिया से लौटकर दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचा। जांच एजेंसियों ने यह भी दावा किया कि उसके संपर्क अन्य फरार आरोपियों प्रिंस जायसवाल और सुमित उर्फ स्मिथ मैनेजर गिरी से जुड़े हुए थे।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नितिन वी. जिवाने ने आदेश में कहा कि आरोपी की भूमिका उन सह-आरोपियों से अलग है जिन्हें पहले ही जमानत मिल चुकी है। अदालत ने टिप्पणी की, “आरोपी की भूमिका यह दर्शाती है कि वह गिरोह का सक्रिय सदस्य था, जिसने अपराध को अंजाम देने और अपराध से प्राप्त धन के प्रवाह को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।”

अदालत ने आगे कहा कि आर्थिक अपराध की गंभीरता, फरार होने का इतिहास और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने की संभावना को देखते हुए जमानत देना उचित नहीं होगा।

इस बीच, मामले पर साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने कहा कि ऐसे मामलों में अपराधियों की कार्यप्रणाली तेजी से विकसित हो रही है और डिजिटल अरेस्ट जैसे फ्रॉड अब संगठित साइबर सिंडिकेट का रूप ले चुके हैं। उन्होंने कहा कि “ऐसे नेटवर्क में अपराधी मनोवैज्ञानिक दबाव, फर्जी सरकारी पहचान और तकनीकी साधनों का उपयोग कर पीड़ित को पूरी तरह नियंत्रण में ले लेते हैं, जिससे बड़े वित्तीय नुकसान होते हैं।”

उन्होंने आगे यह भी जोड़ा कि इस तरह के मामलों में अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन, बैंकिंग ट्रेल और क्रिप्टो या विदेशी लेनदेन की निगरानी को और मजबूत करना आवश्यक है, क्योंकि ऐसे नेटवर्क अक्सर सीमाओं के पार काम करते हैं।

फिलहाल, जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क की फंड ट्रेल और अंतरराष्ट्रीय लिंक की गहन जांच में जुटी हुई हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस गिरोह में और कौन-कौन लोग शामिल थे और अभी कितनी राशि अनट्रेस्ड है।

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