कानपुर। अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट की जांच में एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। जेल में बंद मुदस्सिर सिद्दीकी उर्फ ‘डॉ. अली’ ने पूछताछ में स्वीकार किया है कि वह महज 12वीं पास है, बावजूद इसके उसने किडनी जैसे जटिल ऑपरेशन करने का दावा किया। इस सनसनीखेज खुलासे ने स्वास्थ्य व्यवस्था और अवैध मेडिकल नेटवर्क पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जांच के दौरान आरोपी ने बताया कि उसने दिल्ली से ओटी (ऑपरेशन थिएटर) टेक्नीशियन का कोर्स किया था और वहीं एक निजी अस्पताल में काम करते हुए उसने किडनी ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया देखी और सीखने का दावा किया। हालांकि जांच एजेंसियां उसके इस दावे पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर रही हैं और यह जांच की जा रही है कि वह खुद ऑपरेशन करता था या किसी प्रशिक्षित डॉक्टर की टीम का हिस्सा भर था।
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यह मामला कानपुर में सामने आए अवैध किडनी ट्रांसप्लांट गिरोह से जुड़ा है, जिसमें अब तक 11 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। इस नेटवर्क में शामिल अन्य आरोपियों की तलाश जारी है और विभिन्न राज्यों, खासकर दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में टीमें लगातार छापेमारी कर रही हैं।
जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी ने 16 अप्रैल को कोर्ट में आत्मसमर्पण किया था। इसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। पुलिस ने अदालत से अनुमति लेकर जेल में ही उससे पूछताछ की, जिसमें कई अहम जानकारियां सामने आईं। आरोपी ने दावा किया कि उसने कानपुर में करीब 10 किडनी ऑपरेशन किए, जिनमें से कुछ मामलों में गंभीर जटिलताएं भी हुईं।
सूत्रों के अनुसार, एक मामले में ऑपरेशन के बाद मरीज को सीधे घर भेज दिया गया, जहां संक्रमण के चलते उसकी हालत बिगड़ गई। एक अन्य महिला की मौत का भी जिक्र सामने आया है, हालांकि आरोपी ने उसकी पहचान स्पष्ट नहीं की। इन मामलों की पुष्टि के लिए पुलिस मेडिकल रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों की जांच कर रही है।
पूछताछ में आरोपी ने यह भी बताया कि उसे प्रत्येक ऑपरेशन के लिए ₹15 से ₹20 लाख तक मिलते थे। यह रकम इस अवैध कारोबार के बड़े नेटवर्क और आर्थिक लाभ को दर्शाती है। हालांकि उसने यह दावा किया कि उसके द्वारा किए गए सभी ऑपरेशन सफल रहे, लेकिन जांच एजेंसियां इस बयान को संदेह की नजर से देख रही हैं।
मामले की जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि आरोपी की मुलाकात वर्ष 2018-19 में रोहित तिवारी से हुई थी, जिसने उसे मेरठ ले जाकर एक अन्य डॉक्टर से मिलवाया। इसके बाद उसने वहां कुछ ऑपरेशन किए और बाद में कानपुर में इस नेटवर्क का हिस्सा बन गया। आरोप है कि अस्पतालों की आड़ में यह पूरा रैकेट संचालित हो रहा था।
इस पूरे प्रकरण ने यह उजागर किया है कि किस तरह बिना पर्याप्त योग्यता वाले लोग गंभीर चिकित्सा प्रक्रियाओं में शामिल होकर लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में सख्त निगरानी और लाइसेंसिंग प्रक्रिया को और मजबूत करने की जरूरत है।
फिलहाल पुलिस आरोपी के कस्टडी रिमांड के लिए साक्ष्य जुटा रही है, ताकि उससे और गहन पूछताछ की जा सके। साथ ही, इस नेटवर्क से जुड़े अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए गए हैं।
यह मामला न केवल एक आपराधिक साजिश का खुलासा करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि अवैध मेडिकल प्रैक्टिस किस हद तक खतरनाक रूप ले चुकी है। आम लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले ऐसे नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।
