जयपुर पुलिस ने DGFT-ICEGATE पोर्टल से जुड़ी कथित स्क्रिप ट्रांसफर धोखाधड़ी में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है; जांच में फर्जी डिजिटल सिग्नेचर और दुबई लिंक सामने आए हैं।

जयपुर DGFT साइबर कांड: फर्जी डिजिटल सिग्नेचर से ₹400 करोड़ की ‘ड्यूटी स्क्रिप्स’ उड़ाई, अंतरराष्ट्रीय गिरोह का पर्दाफाश

Team The420
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जयपुर: राजस्थान की राजधानी में सामने आए एक बड़े साइबर फ्रॉड ने सरकारी डिजिटल सिस्टम की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। Directorate General of Foreign Trade के पोर्टल में सेंध लगाकर शातिरों ने करीब ₹400 करोड़ की ‘ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप्स’ को फर्जी डिजिटल सिग्नेचर के जरिए ट्रांसफर कर लिया। मामले में जोधपुर से पांच आरोपियों—निर्मल सोनी, सुल्तान, नंदकिशोर, अशोक भंडारी और प्रमोद खत्री—को गिरफ्तार किया गया है, जबकि गिरोह का मुख्य सरगना अब भी फरार है।

जांच में सामने आया है कि यह कोई साधारण साइबर ठगी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है, जिसके तार Dubai से जुड़े हुए हैं। आरोपी देश के अलग-अलग हिस्सों—दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान—में बैठकर फर्जी आधार और पैन कार्ड के जरिए डिजिटल सिग्नेचर तैयार करते थे। इसके बाद इन सिग्नेचर्स को दुबई में डाउनलोड कर ऑपरेशन को अंजाम दिया जाता था, ताकि भारतीय जांच एजेंसियों की निगरानी से बचा जा सके।

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दरअसल, DGFT द्वारा निर्यातकों को ‘ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप्स’ दी जाती हैं, जो एक तरह की डिजिटल मुद्रा होती है और जिसका उपयोग सीमा शुल्क भुगतान में किया जाता है। साइबर अपराधियों ने इसी सिस्टम को निशाना बनाया। उन्होंने पहले उद्योगपतियों की प्रोफाइल हैक की, फिर उसमें अपना मोबाइल नंबर और ईमेल अपडेट कर एक्सेस हासिल किया। इसके बाद करोड़ों रुपये की स्क्रिप्स को फर्जी खातों में ट्रांसफर कर दिया गया।

मामले का खुलासा दिसंबर 2025 में तब हुआ, जब एक उद्योगपति ने ₹17.88 लाख की स्क्रिप्स गायब होने की शिकायत दर्ज कराई। शुरुआती जांच में यह मामूली मामला लगा, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, ठगी का आंकड़ा बढ़कर ₹400 करोड़ तक पहुंच गया। यह देश में अपनी तरह का पहला बड़ा मामला माना जा रहा है, जिसमें सीधे सरकारी डिजिटल स्क्रिप्स को निशाना बनाया गया।

जांच एजेंसियों के अनुसार, गिरोह स्क्रिप्स को सीधे कैश में बदलने के बजाय उन्हें कई फर्जी खातों के जरिए घुमाता था। अंत में इन स्क्रिप्स को अन्य व्यापारियों को सस्ते दामों पर बेच दिया जाता था, जो इन्हें सीमा शुल्क चुकाने के लिए इस्तेमाल करते थे। इस पूरी प्रक्रिया में भारी नकदी अर्जित की जाती थी, जिससे ट्रांजैक्शन को ट्रैक करना और मुश्किल हो जाता था।

इस साइबर कांड ने डिजिटल सिग्नेचर अथॉरिटी और सरकारी पोर्टल्स के बीच समन्वय की गंभीर कमी को भी उजागर किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पहचान सत्यापन और लॉगिन सुरक्षा मजबूत होती, तो इस तरह की सेंधमारी को रोका जा सकता था। यह मामला दिखाता है कि हाई-वैल्यू डिजिटल एसेट्स वाले प्लेटफॉर्म्स पर मल्टी-लेयर सिक्योरिटी और रियल-टाइम मॉनिटरिंग कितनी जरूरी है।

केंद्रीय स्तर पर भी इस मामले को गंभीरता से लिया गया है। Indian Cyber Crime Coordination Centre सहित संबंधित एजेंसियों को अलर्ट पर रखा गया है और इस तरह के हमलों को रोकने के लिए सिस्टम ऑडिट शुरू किए गए हैं। साथ ही, अन्य निर्यातकों को भी सतर्क रहने और अपने DGFT अकाउंट्स की सुरक्षा मजबूत करने की सलाह दी गई है।

साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना केवल एक वित्तीय धोखाधड़ी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि साइबर अपराधी अब सरकारी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को भी निशाना बना रहे हैं। डिजिटल इंडिया के बढ़ते दायरे के साथ ऐसे हमलों का खतरा भी बढ़ रहा है, जिससे निपटने के लिए तकनीकी और नीतिगत दोनों स्तरों पर सुधार जरूरी है।

फिलहाल, जांच एजेंसियां मुख्य सरगना और दुबई में बैठे अन्य नेटवर्क ऑपरेटर्स की तलाश में जुटी हैं। माना जा रहा है कि इस गिरोह के तार और भी बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े हो सकते हैं। आने वाले दिनों में इस मामले में और खुलासे होने की संभावना है, जो देश की साइबर सुरक्षा रणनीति के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं

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