रेलवे के करीब ₹22 करोड़ के टेंडरों में कथित फर्जी दस्तावेज लगाने के मामले में ठेकेदार Ajay Kumar के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज किया गया है। इंजीनियरिंग विभाग की शिकायत पर इज्जतनगर थाने में मुकदमा दर्ज हुआ है। पुलिस अब पूरे मामले की छानबीन में जुट गई है।
आरोप है कि पटेलनगर निवासी अजय कुमार, जो मैसर्स अजय कंस्ट्रक्शन के मालिक हैं, ने पांच अलग-अलग निविदाओं में निर्धारित न्यूनतम योग्यता मानकों को पूरा न करने के बावजूद फर्जी और अमान्य दस्तावेज प्रस्तुत किए। जांच में सामने आया कि निविदा प्रक्रिया के दौरान गलत तरीके से तैयार किए गए प्रपत्र और अवैध पार्टनरशिप डीड लगाई गई थी।
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रेलवे सूत्रों के अनुसार, फर्म ने तकनीकी और वित्तीय अर्हता पूरी न होने के बावजूद विभाग को गुमराह करने की कोशिश की। आरोप है कि मैसर्स नरेंद्र देव रेलवेज, बरेली के क्रेडेंशियल भी जानबूझकर निविदाओं के साथ संलग्न किए गए, जबकि उनकी वैधता संदिग्ध थी। विभागीय जांच में इन दस्तावेजों को अमान्य और निष्प्रभावी पाया गया।
बताया जा रहा है कि पूर्वोत्तर रेलवे के सतर्कता विभाग ने जब टेंडर प्रक्रिया की विस्तृत जांच की, तब यह अनियमितता पकड़ में आई। रिपोर्ट के आधार पर इज्जतनगर थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया। अब पुलिस दस्तावेजों की सत्यता, फर्म की पात्रता और टेंडर प्रक्रिया में अपनाई गई विधि की पड़ताल कर रही है।
मामले में यह भी सामने आया है कि संबंधित टेंडरों की कुल अनुमानित लागत करीब ₹22 करोड़ थी। आरोप है कि निविदाओं में न्यूनतम वित्तीय और तकनीकी योग्यता के अभाव के बावजूद फर्जी दस्तावेजों के सहारे पात्रता दर्शाई गई। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या इस पूरे प्रकरण में किसी और की भी भूमिका रही है।
दूसरी ओर, अजय कुमार ने अपने ऊपर लगे आरोपों को लेकर कहा है कि इससे पहले भी इसी मामले में उनके खिलाफ कार्रवाई हो चुकी है। उनके अनुसार, पूर्व में दर्ज मुकदमे के बाद रेल बोर्ड ने उनकी फर्म को दो साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया था। इसके अलावा रेलवे ने फर्म पर पेनाल्टी भी लगाई और सिक्योरिटी मनी जब्त कर ली थी।
अजय कुमार का कहना है कि जिस टेंडर को लेकर विवाद है, वह ₹22 करोड़ का था और मामला वर्तमान में अदालत में लंबित है। उनका दावा है कि पूरे प्रकरण की सुनवाई न्यायालय में चल रही है और अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है।
इधर, पुलिस का कहना है कि शिकायत के आधार पर भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच और विभागीय अभिलेखों का मिलान कराया जा रहा है। यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं तो आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
रेलवे विभाग के सूत्रों का कहना है कि टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाया जा रहा है। विभागीय स्तर पर भी रिकॉर्ड की समीक्षा की जा रही है, ताकि भविष्य में इस तरह की अनियमितताओं को रोका जा सके।
फिलहाल मामला कोर्ट में विचाराधीन है और पुलिस की जांच जारी है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
