अलीगढ़ पुलिस ने जनसेवा केंद्र संचालकों प्रशांत-पवन को पानी-पूरी विक्रेता के दस्तावेजों से साइबर ठगी के आरोप में गिरफ्तार किया।

पानी-पूरी विक्रेता के नाम पर खाता खोलकर ठगी, जनसेवा केंद्र संचालक समेत दो गिरफ्तार

Team The420
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महुआखेड़ा क्षेत्र में रिश्तेदार बनकर दुर्घटना में मदद के नाम पर ₹40 हजार की साइबर ठगी करने वाले गिरोह का खुलासा करते हुए पुलिस ने दो जनसेवा केंद्र संचालकों को गिरफ्तार किया है। आरोपियों ने एक पानी-पूरी विक्रेता के दस्तावेजों का दुरुपयोग कर उसके नाम से बैंक खाता खुलवाया और उसी खाते में ठगी की रकम मंगाई थी। मामले में एक अन्य आरोपी फरार है, जिसकी तलाश में पुलिस दबिश दे रही है।

पुलिस के अनुसार, 19 जनवरी को पीड़ित ने राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई थी कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने फोन पर खुद को रिश्तेदार बताते हुए दुर्घटना में फंसे होने का बहाना बनाया और तत्काल सहायता के नाम पर ₹40 हजार ट्रांसफर करवा लिए। शिकायत मिलने के बाद साइबर सेल और स्थानीय पुलिस ने संयुक्त जांच शुरू की।

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तकनीकी विश्लेषण में सामने आया कि ठगी की रकम अकराबाद कस्बे के एक पानी-पूरी विक्रेता के बैंक खाते में गई है। पुलिस ने जब विक्रेता से पूछताछ की तो उसने बताया कि कुछ दिन पहले वह एक जनसेवा केंद्र पर उद्यम प्रमाणपत्र बनवाने गया था और वहां अपने आधार व अन्य दस्तावेज जमा किए थे। उसे बैंक खाता खुलने की जानकारी नहीं थी।

इसके बाद पुलिस ने जनसेवा केंद्र संचालक प्रशांत और उसके सहयोगी पवन को गिरफ्तार कर लिया। तलाशी के दौरान उनके पास से दो लैपटॉप, चार बायोमीट्रिक मशीनें, तीन मोबाइल फोन तथा कूटरचित आधार और पैन कार्ड बरामद किए गए। पुलिस का कहना है कि इन उपकरणों का उपयोग फर्जी खाते खोलने और ई-केवाईसी के दुरुपयोग के लिए किया जाता था।

पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि वे जनसेवा केंद्र पर आने वाले ग्राहकों के दस्तावेजों की कॉपी अपने पास रख लेते थे और बाद में उन दस्तावेजों के आधार पर अलग मोबाइल नंबर लिंक कर बैंक खाते खुलवा देते थे। इन खातों का उपयोग साइबर ठगी की रकम मंगाने के लिए किया जाता था।

जांच में यह भी सामने आया कि फरार आरोपी सचिन उर्फ सुमित मोबाइल नंबर उपलब्ध कराता था, जिन्हें फर्जी या अस्थायी पहचान के साथ बैंक खातों से लिंक किया जाता था। पुलिस उसके संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही है।

अधिकारियों के अनुसार, आरोपियों ने एनएसडीएल बैंक के माध्यम से खाता खुलवाया था और खाते की जानकारी वास्तविक दस्तावेज धारक को नहीं दी गई। ठगी की रकम आने के बाद उसे तुरंत निकाल लिया जाता था, ताकि डिजिटल ट्रेल कम से कम रहे।

मामले में आरोपियों के खिलाफ साइबर धोखाधड़ी, जालसाजी, आईटी एक्ट और कूटरचना से संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। बरामद डिजिटल उपकरणों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि ऐसे कितने खाते खोले गए और कितनी रकम का लेनदेन हुआ।

पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या इसी तरीके से अन्य लोगों के दस्तावेजों का दुरुपयोग कर म्यूल खाते बनाए गए और क्या आरोपियों का संबंध किसी बड़े साइबर ठगी नेटवर्क से है।

जांच एजेंसियों ने जनसेवा केंद्रों पर आने वाले नागरिकों को सलाह दी है कि दस्तावेज जमा करते समय उसकी रसीद अवश्य लें और यह सुनिश्चित करें कि उनके नाम से कोई अनधिकृत बैंक खाता या सिम कार्ड न खोला जाए। समय-समय पर अपने बैंक स्टेटमेंट और क्रेडिट रिपोर्ट की जांच भी करते रहें।

अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद और खुलासे होने की संभावना है। फरार आरोपी की गिरफ्तारी के बाद पूरे नेटवर्क की भूमिका स्पष्ट हो सकेगी।

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