उत्तर प्रदेश के वाराणसी में साइबर अपराध का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पारंपरिक साइबर ठगी और संगठित अपराध के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया। रोहनिया थाना क्षेत्र के अवलेशपुर स्थित सौरभ विहार कॉलोनी में किराना व्यवसायी जितेंद्र पटेल की हत्या के मामले का खुलासा करते हुए पुलिस ने पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि हत्या का मकसद पीड़ित के बैंक खाते में जमा ₹26 लाख तक पहुंच बनाना था। पुलिस के अनुसार, साइबर ठगी की योजना को सफल बनाने के लिए शूटर के जरिए हत्या कराने का यह बेहद गंभीर मामला है।
इस सनसनीखेज वारदात की गुत्थी सुलझाने के लिए पुलिस ने लगभग 2,000 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली। करीब 50 पुलिसकर्मियों की टीम लगातार जांच में जुटी रही। करसड़ा क्षेत्र में हुई मुठभेड़ के दौरान शूटर समेत दो आरोपी घायल हो गए। पुलिस ने उनके कब्जे से ₹1.78 लाख नकद, अवैध हथियार, सिम कार्ड, क्यूआर कोड, डेबिट कार्ड, मोबाइल फोन, लैपटॉप और साइबर ठगी में इस्तेमाल होने वाला अन्य सामान बरामद किया।
पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपियों में सुशील पटेल उर्फ गोलू (शूटर), गियांशु पटेल उर्फ बाबू, आयुष पटेल उर्फ भोला, अमन सेठ और मनीष सिंह शामिल हैं। सभी आरोपियों की उम्र 19 से 23 वर्ष के बीच बताई गई है।
जांच में पता चला कि करीब छह महीने पहले गियांशु और आयुष ‘पेटीएम केवाईसी’ अपडेट करने के बहाने जितेंद्र पटेल की दुकान पर पहुंचे थे। मोबाइल में केवाईसी प्रक्रिया के दौरान उन्हें पीड़ित के बैंक खाते में ₹26 लाख जमा होने की जानकारी मिली। इसके बाद दोनों ने पहले मोबाइल लूटने और बाद में हत्या कर मोबाइल हासिल करने की साजिश रची। योजना में अमन सेठ और मनीष सिंह को भी शामिल किया गया तथा पीड़ित की कई दिनों तक रेकी की गई। बाद में बिहार के मुंगेर से अवैध पिस्टल मंगाकर वारदात की तैयारी पूरी की गई।
पुलिस के अनुसार, घटना वाले दिन आरोपी बिना नंबर की रोनिन बाइक से पीड़ित का पीछा कर रहे थे। घर से करीब 100 मीटर पहले बाइक पर पीछे बैठे शूटर ने जितेंद्र पटेल को गोली मार दी। पहली गोली पीठ में लगी, जिसके बाद पीड़ित घर की ओर भागा। दूसरी गोली सिर पर मारने की कोशिश की गई, लेकिन निशाना चूक गया। वारदात के दौरान अन्य आरोपी एक ऑरा कार से पूरे ऑपरेशन में सहयोग कर रहे थे और घटना के बाद सभी गांवों के रास्ते फरार हो गए।
पूछताछ में सामने आया कि आरोपी आईटीआई, बीएससी, बीए और इंटर तक शिक्षित हैं। उन्होंने कथित तौर पर साइबर अपराध पर आधारित वेब सीरीज ‘जामताड़ा’ से प्रभावित होकर कम समय में पैसा कमाने के लिए साइबर ठगी का रास्ता चुना। आयुष पहले एक डिजिटल भुगतान कंपनी से जुड़ा था और दुकानदारों की केवाईसी के दौरान उनके क्यूआर कोड और अन्य जानकारियां हासिल करता था। बाद में उसने अपना गिरोह बना लिया।
गिरोह मुख्य रूप से बुजुर्ग और डिजिटल रूप से कम जागरूक दुकानदारों को निशाना बनाता था। केवाईसी के नाम पर मोबाइल अपने कब्जे में लेकर विभिन्न लोन ऐप्स से ऋण स्वीकृत कराया जाता था। इसके बाद मोबाइल की सिम निकालकर उसका उपयोग ऑनलाइन भुगतान के जरिए सोने-चांदी के आभूषण खरीदने और अन्य वित्तीय लेनदेन में किया जाता था।
पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से 7.65 बोर की पिस्टल, .315 बोर का तमंचा, 10 पेटीएम मशीनें, 29 डेबिट कार्ड, 20 मोबाइल फोन, 116 क्यूआर कोड, एप्पल लैपटॉप, 9 सिम कार्ड, वाई-फाई डोंगल, पासबुक और चेकबुक बरामद किए हैं। जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह वाराणसी के अलावा लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, अयोध्या और चंदौली में भी साइबर ठगी की घटनाओं में सक्रिय रहा है। इस बड़ी सफलता पर पुलिस आयुक्त ने जांच टीम को ₹1 लाख का पुरस्कार देने की घोषणा की है।
इस मामले पर प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि साइबर अपराध अब केवल डिजिटल दुनिया तक सीमित नहीं रहा है। संगठित गिरोह पहले सोशल इंजीनियरिंग और केवाईसी जैसे बहानों से संवेदनशील वित्तीय जानकारी जुटाते हैं और कई मामलों में सबूत मिटाने या रकम तक पहुंच बनाने के लिए हिंसक अपराध का भी सहारा लेने लगे हैं। उन्होंने कहा कि नागरिकों को किसी भी व्यक्ति को मोबाइल फोन, ओटीपी, बैंकिंग ऐप या केवाईसी प्रक्रिया के नाम पर नियंत्रण नहीं सौंपना चाहिए और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना संबंधित एजेंसियों को देनी चाहिए।
