अमेरिकी अधिकारियों ने कथित तौर पर ईरान को चेतावनी दी थी कि इजरायल शांति वार्ता में शामिल तेहरान के दो शीर्ष नेताओं की हत्या का प्रयास कर सकता है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका को आशंका थी कि यदि ऐसा हुआ तो युद्ध समाप्त करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए चल रहे कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह विफल हो सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन को यह चिंता थी कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ संभावित रूप से निशाने पर हो सकते हैं। अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि इन नेताओं की हत्या से शांति वार्ता बाधित हो जाएगी और क्षेत्र में संघर्ष दोबारा भड़क सकता है।
बताया गया है कि स्थिति को गंभीर मानते हुए अमेरिका ने क्षेत्रीय मध्यस्थों के माध्यम से तेहरान तक यह संदेश पहुंचाया कि दोनों नेताओं की सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरती जाए। साथ ही, अमेरिकी अधिकारियों ने कथित तौर पर मार्च से ही इजरायली पक्ष से भी आग्रह किया था कि कूटनीतिक प्रयास जारी रहने तक ईरान के राजनीतिक नेतृत्व को निशाना न बनाया जाए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति प्रशासन शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के पक्ष में था और उसका मानना था कि वार्ता को सफल बनाने के लिए प्रमुख वार्ताकारों की सुरक्षा आवश्यक है। हालांकि, इस संबंध में इजरायल की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, समय के साथ वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच ईरान को लेकर रणनीतिक मतभेद भी उभरने लगे। शुरुआती चरण में दोनों देशों की प्राथमिकताएं समान थीं, लेकिन बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने आकलन किया कि ईरान की राजनीतिक और सैन्य व्यवस्था निकट भविष्य में बनी रह सकती है। इसके बाद अमेरिका ने सैन्य विकल्पों की बजाय बातचीत के माध्यम से समाधान पर अधिक जोर देना शुरू किया।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि अप्रैल में युद्धविराम के बाद भी अमेरिकी अधिकारियों को आशंका थी कि ईरान के वरिष्ठ नेताओं पर हमला किया जा सकता है। इसी कारण क्षेत्रीय माध्यमों से तेहरान को संभावित खतरे की जानकारी दी गई। कथित तौर पर ऐसी खुफिया सूचनाओं के बाद संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ की यात्रा के दौरान भी अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपनाए गए।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि किसी प्रमुख वार्ताकार की हत्या होती, तो चल रही शांति प्रक्रिया ध्वस्त हो सकती थी और क्षेत्र में एक बार फिर व्यापक सैन्य टकराव शुरू होने का जोखिम बढ़ जाता।
साइबर एवं सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक भू-राजनीतिक संघर्षों में पारंपरिक सैन्य अभियानों के साथ-साथ खुफिया सूचनाएं, साइबर गतिविधियां और दुष्प्रचार अभियान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका कहना है कि संवेदनशील कूटनीतिक प्रक्रियाओं के दौरान विश्वसनीय खुफिया सत्यापन, सुरक्षित संचार व्यवस्था और बहु-स्तरीय सुरक्षा समन्वय किसी भी संभावित व्यवधान या लक्षित हमले के जोखिम को कम करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
