सोशल मीडिया मंचों पर बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े कथित विज्ञापनों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।

सोशल मीडिया पर बाल यौन शोषण सामग्री के विज्ञापनों का मामला, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

Team The420
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नई दिल्ली: सोशल मीडिया मंचों पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (CSCM) को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों के आरोपों को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लिया है। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामला ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस’ की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सोशल मीडिया मंच सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं कर रहे हैं और अब भी ऐसी सामग्री को बढ़ावा देने वाले विज्ञापन उपयोगकर्ताओं तक पहुंच रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा विधि एवं न्याय मंत्रालय से जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता संस्था को सोशल मीडिया मंचों को भी मामले में पक्षकार बनाने के लिए आवश्यक आवेदन दाखिल करने की अनुमति दी। इससे मामले में संबंधित इंटरनेट मीडिया कंपनियों की भूमिका और उनकी कानूनी जिम्मेदारियों पर सीधे विचार किए जाने का रास्ता साफ हो गया है।

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याचिकाकर्ता संस्था ने विशेष रूप से इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों का मुद्दा उठाया है। संस्था का कहना है कि ऐसी सामग्री बच्चों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है और इसे रोकने के लिए केवल सामग्री हटाना पर्याप्त नहीं है। मंचों को ऐसी सामग्री की पहचान, उसकी रिपोर्टिंग, डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ समन्वय के लिए स्पष्ट और बाध्यकारी व्यवस्था अपनानी चाहिए।

याचिका में सोशल मीडिया मध्यस्थों के लिए एक विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार कर उसे अधिसूचित करने की मांग की गई है। प्रस्तावित व्यवस्था में CSCM की पहचान और अनिवार्य रिपोर्टिंग के साथ-साथ संबंधित डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया भी शामिल करने की मांग है। संस्था ने कहा है कि रिपोर्ट मिलने के बाद कानून लागू करने वाली एजेंसियों की ओर से समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि अपराधियों तक पहुंचने और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में देरी न हो।

याचिका में अपराधियों से संबंधित विवरण राष्ट्रीय यौन अपराधी डाटा बेस (NDSO) पर तत्काल अपलोड करने की मांग भी की गई है। इसके अलावा, जिन मध्यस्थों पर अनिवार्य रिपोर्टिंग संबंधी कानूनी दायित्व लागू होते हैं, उनके उल्लंघन की स्थिति में आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का प्रावधान सुनिश्चित करने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि बाल यौन शोषण सामग्री का ऑनलाइन प्रसार केवल तकनीकी या प्लेटफॉर्म संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि इससे बच्चों की सुरक्षा और आपराधिक न्याय व्यवस्था दोनों प्रभावित होते हैं। ऐसे मामलों में रिपोर्टिंग और कार्रवाई के बीच समय का अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए सोशल मीडिया कंपनियों, पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच स्पष्ट जिम्मेदारी और समन्वय की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से केंद्र से जवाब मांगे जाने और सोशल मीडिया मंचों को पक्षकार बनाने की अनुमति दिए जाने के बाद अब मामले में केंद्र और संबंधित मंचों का पक्ष सामने आएगा। अदालत के समक्ष यह भी स्पष्ट हो सकता है कि सितंबर 2024 में दिए गए निर्देशों को लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और बाल यौन शोषण सामग्री की पहचान तथा रिपोर्टिंग के लिए मौजूदा व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

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