नई दिल्ली: गाजियाबाद की लगभग 19 वर्षों से लंबित एक आवासीय परियोजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) के रवैये पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। न्यायालय ने कहा कि प्रशासनिक उदासीनता और समय पर निर्णय न लेने के कारण सैकड़ों फ्लैट खरीदार वर्षों से अपने घरों का इंतजार कर रहे हैं। अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि परियोजना से संबंधित डेवलपमेंट लाइसेंस के नवीनीकरण तथा संशोधित भवन मानचित्र को मंजूरी देने के मुद्दे पर दो सप्ताह के भीतर स्पष्ट निर्णय लेकर उसका कारण सहित विवरण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि फ्लैट खरीदारों के हितों की रक्षा करना संबंधित सरकारी विभागों और विकास प्राधिकरणों की जिम्मेदारी है। यदि अधिकारी समय पर निर्णय लेने में विफल रहते हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन नागरिकों को उठाना पड़ता है जिन्होंने वर्षों पहले अपनी जीवनभर की बचत आवास खरीदने में लगाई होती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण उत्पन्न होने वाले ऐसे विवाद न्यायिक व्यवस्था पर भी अतिरिक्त बोझ डालते हैं और इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार और जीडीए को अंतिम अवसर देते हुए कहा कि वे परियोजना से जुड़े सभी लंबित प्रशासनिक निर्णय निर्धारित समय सीमा के भीतर लें। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि निर्धारित अवधि में संतोषजनक प्रगति नहीं होती है तो आगे उचित न्यायिक आदेश पारित किए जा सकते हैं। मामले की अगली सुनवाई में संबंधित अधिकारियों से विस्तृत स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाएगा कि परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
यह मामला उन अनेक आवासीय परियोजनाओं की चुनौतियों को भी सामने लाता है, जहां कानूनी विवाद, प्रशासनिक देरी, लाइसेंस संबंधी प्रक्रियाएं या स्वीकृतियों में विलंब के कारण हजारों घर खरीदार लंबे समय तक अपने फ्लैटों का कब्जा प्राप्त नहीं कर पाते। रियल एस्टेट क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में समयबद्ध प्रशासनिक निर्णय और नियामकीय पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है, ताकि खरीदारों का भरोसा बना रहे और परियोजनाएं अनिश्चितकाल तक लंबित न रहें।
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इसी संदर्भ में कानूनी विशेषज्ञों ने आवासीय सोसायटियों में साझा सुविधाओं के उपयोग को लेकर भी महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। उनके अनुसार, किसी भी रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) या अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन को केवल इस आधार पर किसी निवासी को जिम, क्लब हाउस, स्विमिंग पूल या अन्य साझा सुविधाओं के उपयोग से वंचित करने का अधिकार नहीं है कि उसका फ्लैट आकार में छोटा है या वह अपेक्षाकृत कम मेंटेनेंस शुल्क देता है। साझा सुविधाएं सभी पात्र निवासियों के लिए समान रूप से उपलब्ध होती हैं और उनके उपयोग में मनमाना भेदभाव कानून की भावना के अनुरूप नहीं माना जाता।
विशेषज्ञों का कहना है कि फ्लैट के क्षेत्रफल के आधार पर मेंटेनेंस शुल्क में अंतर हो सकता है, क्योंकि कई सोसायटियों में शुल्क संपत्ति के आकार के अनुसार निर्धारित किया जाता है। हालांकि, केवल वित्तीय योगदान या फ्लैट के आकार के आधार पर निवासियों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर साझा सुविधाओं के उपयोग पर रोक लगाना उचित नहीं माना जाता। यदि किसी सोसायटी द्वारा ऐसा किया जाता है तो प्रभावित निवासी पहले संबंधित आरडब्ल्यूए या अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
यदि शिकायत के बावजूद समाधान नहीं निकलता, तो प्रभावित पक्ष उपलब्ध कानूनी उपायों का सहारा ले सकता है, जिनमें परिस्थितियों के अनुसार सक्षम सिविल न्यायालय या उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाना शामिल हो सकता है। कानूनी विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि किसी विवाद की स्थिति में निवासी स्वयं मेंटेनेंस शुल्क का भुगतान बंद न करें। यदि आरडब्ल्यूए का कोई निर्णय अनुचित प्रतीत होता है, तो उसे विधिक प्रक्रिया के माध्यम से चुनौती दी जानी चाहिए। मेंटेनेंस शुल्क रोकने पर सोसायटी उपनियमों के अनुसार विलंब शुल्क, दंड या वसूली की कार्रवाई भी कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए अपने अधिकारों की रक्षा करना और साथ ही निर्धारित वित्तीय दायित्वों का पालन करना ही सबसे सुरक्षित और व्यावहारिक तरीका है।
