फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ऋण लेकर राशि के दुरुपयोग का दोषी ठहराया; अदालत ने कहा- वन टाइम सेटलमेंट से आपराधिक दायित्व समाप्त नहीं होता, साक्ष्यों के अभाव में पूर्व बैंक अधिकारी को राहत

यूको बैंक ₹7 करोड़ ऋण धोखाधड़ी मामले में सीबीआई अदालत का फैसला: द्वारकाधीश स्पिनर्स के तीन पूर्व निदेशक दोषी, पूर्व बैंक अधिकारी बरी

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By Roopa
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नई दिल्ली: दिल्ली स्थित केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत ने करीब 25 वर्ष पुराने यूको बैंक के ₹7 करोड़ ऋण धोखाधड़ी मामले में द्वारकाधीश स्पिनर्स लिमिटेड (डीएसएल) के तीन पूर्व निदेशकों को दोषी ठहराया है। अदालत ने माना कि आरोपियों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बैंक से ऋण प्राप्त किया और बाद में स्वीकृत उद्देश्य के बजाय राशि का दुरुपयोग किया। हालांकि, अदालत ने बैंक के तत्कालीन अधिकारी बिकाश बसु को साक्ष्यों के अभाव में बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष उनके कथित आपराधिक षड्यंत्र में शामिल होने या किसी अवैध लाभ प्राप्त करने का आरोप साबित नहीं कर सका।

राउज एवेन्यू स्थित सीबीआई की विशेष अदालत के न्यायाधीश सुधांशु कौशिक ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने डीएसएल के पूर्व निदेशक अमित चतुर्वेदी, संजय चतुर्वेदी और परवीन जुनेजा को आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी तथा जाली दस्तावेजों को असली के रूप में इस्तेमाल करने का दोषी पाया। दोषियों की सजा पर अलग से सुनवाई की जाएगी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार मामला वर्ष 2001 का है, जब द्वारकाधीश स्पिनर्स लिमिटेड ने यूको बैंक की संसद मार्ग शाखा से ₹7 करोड़ का ऋण प्राप्त करने के लिए आवेदन किया था। कंपनी ने दावा किया था कि इस राशि का उपयोग इंडस्ट्रियल फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (आईएफसीआई) से लिए गए पुराने ऋण के प्री-पेमेंट के लिए किया जाएगा। इन्हीं दावों के आधार पर बैंक ने ऋण प्रस्ताव को मंजूरी दी।

जांच में सामने आया कि ऋण स्वीकृत होने के बाद कंपनी ने बैंक को बताया कि आईएफसीआई ने प्री-पेमेंट स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। इसके बाद आरोपियों ने ऋण को केंद्र सरकार की टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन फंड स्कीम (टीयूएफएस) के तहत नई मशीनरी खरीदने और स्थापित करने के उद्देश्य से उपयोग करने की अनुमति प्राप्त कर ली। जांच एजेंसियों का आरोप है कि ऋण के उद्देश्य में यह बदलाव बैंक से धनराशि हासिल कर उसका दुरुपयोग करने की सुनियोजित योजना का हिस्सा था।

सीबीआई की जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने नई मशीनरी की खरीद और स्थापना का दावा साबित करने के लिए फर्जी चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) प्रमाणपत्र और एक काल्पनिक कंपनी के नाम से तैयार किए गए जाली बिल बैंक में जमा किए। हालांकि जांच में पाया गया कि कोई नई मशीनरी खरीदी ही नहीं गई थी। इसके बजाय ₹7 करोड़ की ऋण राशि कथित तौर पर समूह की अन्य कंपनियों में स्थानांतरित कर दी गई और स्वीकृत उद्देश्य के लिए उसका उपयोग नहीं किया गया।

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करीब 160 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि आरोपियों की शुरुआत से ही बैंक को धोखा देने की मंशा थी। अदालत ने माना कि फर्जी दस्तावेजों, भ्रामक प्रस्तुतियों और ऋण राशि के दुरुपयोग से यह सिद्ध होता है कि बैंक से ऋण प्राप्त करने के लिए सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र रचा गया था।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला केवल ऋण चूक या व्यावसायिक विवाद का नहीं है। यदि ऋण फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त किया गया हो और धनराशि का जानबूझकर गलत उपयोग किया गया हो, तो यह दीवानी दायित्व के साथ-साथ आपराधिक अपराध भी बनता है।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि कंपनी द्वारा यूको बैंक के साथ वन टाइम सेटलमेंट (ओटीएस) किए जाने के बाद आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो जानी चाहिए। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि बैंक के साथ बकाया राशि का निपटारा कर लेने से फर्जी दस्तावेजों, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र से जुड़े अपराध समाप्त नहीं हो जाते और न ही इससे आपराधिक दायित्व खत्म होता है।

पूर्व बैंक अधिकारी बिकाश बसु को बरी करते हुए अदालत ने कहा कि ऋण प्रस्ताव का मूल्यांकन और अनुमोदन केवल उनके स्तर पर नहीं हुआ था, बल्कि वरिष्ठ अधिकारियों ने भी उसकी समीक्षा की थी। अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि बसु ने जानबूझकर कथित साजिश में भाग लिया या उन्हें कोई अवैध लाभ प्राप्त हुआ। इसलिए उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। वहीं, तीनों दोषी पूर्व निदेशकों की सजा पर अदालत बाद में सुनवाई करेगी।

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