“निवारक हिरासत के खिलाफ याचिकाएं खारिज, अदालत ने कहा—प्रक्रियात्मक अनुपालन पर्याप्त, जांच में हस्तक्षेप का खतरा मौजूद”

“गोल्ड स्मगलिंग केस में बड़ा फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने कन्नड़ अभिनेत्री रान्या राव की COFEPOSA डिटेंशन को बरकरार रखा”

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली। कन्नड़ फिल्म अभिनेत्री रान्या राव उर्फ हरशवर्धिनी रान्या से जुड़े हाई-प्रोफाइल गोल्ड स्मगलिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए उनकी निवारक हिरासत (Preventive Detention) को बरकरार रखा है। अदालत ने केंद्रीय आर्थिक खुफिया ब्यूरो (CEIB) द्वारा जारी हिरासत आदेश को वैध ठहराते हुए कहा कि COFEPOSA अधिनियम के तहत की गई कार्रवाई में किसी प्रकार की गंभीर कानूनी या संवैधानिक त्रुटि नहीं पाई गई।

यह मामला कथित संगठित सोना तस्करी से जुड़ा है, जिसमें रान्या राव और उनके सहयोगी सईल सरकरिया जैन को आरोपी बनाया गया है। दोनों ने हिरासत आदेश को कई आधारों पर चुनौती दी थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, 3 मार्च 2025 को बेंगलुरु स्थित केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (DRI) की टीम ने खुफिया जानकारी के आधार पर रान्या राव को रोका था। तलाशी के दौरान उनके पास से लगभग 14.2 किलोग्राम विदेशी निशान वाले सोने की 17 बारें बरामद की गईं। इसके बाद कस्टम्स एक्ट की धारा 108 के तहत उनके बयान दर्ज किए गए।

जांच में आगे आरोप लगा कि उनके सहयोगी सईल सरकरिया जैन ने नवंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच कई बार अवैध सोने की खेप के निपटान और वितरण में भूमिका निभाई। इन तथ्यों के आधार पर 22 अप्रैल 2025 को वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव द्वारा COFEPOSA के तहत दोनों के खिलाफ निवारक हिरासत आदेश जारी किया गया।

हिरासत आदेश को पहले कर्नाटक हाईकोर्ट में भी चुनौती दी गई थी, जहां उसे बरकरार रखा गया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि आवश्यक दस्तावेज समय पर उपलब्ध नहीं कराए गए, भविष्य में तस्करी की तत्काल संभावना नहीं थी और हिरासत आदेश में “Subjective Satisfaction” का अभाव था। साथ ही यह भी कहा गया कि एडवाइजरी बोर्ड के समक्ष प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व से वंचित किया गया।

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सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ—जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमेकापम कोटिश्वर सिंह—ने सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने सभी आवश्यक दस्तावेज तय समय के भीतर उपलब्ध कराए थे और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, जिसमें सीसीटीवी फुटेज भी शामिल है, हिरासत में ही दिखाए गए थे।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि एडवाइजरी बोर्ड के समक्ष वकील के माध्यम से प्रतिनिधित्व का अधिकार हर स्थिति में अनिवार्य नहीं होता। यह अधिकार तभी लागू होता है जब हिरासत प्राधिकारी स्वयं वकील के साथ उपस्थित हो, जो इस मामले में नहीं था।

अपने फैसले में अदालत ने कहा कि हिरासत आदेश में पर्याप्त आधार मौजूद हैं, जिनमें पहले भी विदेशी सोने के निपटान से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख शामिल है। अदालत ने यह भी माना कि कथित गतिविधियों और भविष्य में अपराध की आशंका के बीच “लाइव और प्रॉक्सिमेट लिंक” मौजूद है, जिससे निवारक हिरासत को उचित ठहराया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत दिए गए सुरक्षा प्रावधानों का उल्लंघन नहीं हुआ है और हिरासत आदेश पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप जारी किया गया था। इसी आधार पर दोनों विशेष अनुमति याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और आगे अन्य व्यक्तियों की भूमिका सामने आ सकती है। साथ ही यह भी कहा गया कि पूरे तस्करी नेटवर्क और मनी ट्रेल की गहन जांच जरूरी है ताकि वास्तविक लाभार्थियों और अपराध की पूरी श्रृंखला का पता लगाया जा सके।

इस फैसले के साथ रान्या राव और उनके सहयोगी की कानूनी चुनौती को बड़ा झटका लगा है और COFEPOSA के तहत उनकी निवारक हिरासत फिलहाल जारी रहेगी। यह निर्णय संगठित तस्करी और आर्थिक अपराधों के मामलों में अदालत के सख्त रुख को दर्शाता है।

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