राजेश एक्सपोर्ट्स पर SEBI के आरोपों के बाद ED ने बेंगलुरु समेत कई परिसरों पर छापेमारी कर वित्तीय लेनदेन और फंड फ्लो की जांच शुरू की है।

₹15.15 लाख करोड़ के कथित अकाउंटिंग घोटाले की जांच तेज: राजेश एक्सपोर्ट्स पर ED की छापेमारी, SEBI के आरोपों के बाद बढ़ा दबाव

Team The420
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देश की प्रमुख स्वर्ण आभूषण निर्यातक कंपनियों में शामिल राजेश एक्सपोर्ट्स पर नियामकीय शिकंजा और कसता नजर आ रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मंगलवार को कंपनी और उससे जुड़े लोगों के कई परिसरों पर तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने हाल ही में कंपनी, उसके चेयरमैन राजेश मेहता और कुछ संबद्ध संस्थाओं के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी कर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं।

सूत्रों के अनुसार, सुबह शुरू हुई छापेमारी बेंगलुरु स्थित कई परिसरों पर की गई और जांच एजेंसियां कंपनी के वित्तीय लेनदेन, फंड फ्लो और संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल कर रही हैं। हालांकि ईडी ने आधिकारिक रूप से कार्रवाई के विस्तृत आधार का खुलासा नहीं किया है, लेकिन माना जा रहा है कि यह जांच SEBI द्वारा उजागर की गई कथित अनियमितताओं से जुड़ी हुई है।

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SEBI के अंतरिम आदेश में आरोप लगाया गया है कि कंपनी ने संबंधित पक्षों (Related Entities) के माध्यम से कई स्तरों वाले लेनदेन का जाल तैयार किया, जिससे धन के वास्तविक स्रोत और अंतिम गंतव्य को छिपाया गया। नियामक के अनुसार, इन लेनदेन की संरचना ऐसी थी कि फंड की वास्तविक आवाजाही को समझना कठिन हो गया, जिससे कंपनी की वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हुए।

जांच के दौरान SEBI ने यह भी पाया कि कंपनी कथित तौर पर ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकी जो प्रमोटर राजेश मेहता के व्यक्तिगत बैंक खाते के माध्यम से कंपनी के धन के हस्तांतरण को उचित ठहरा सकें। आरोप है कि अप्रैल 2020 से सितंबर 2025 के बीच कंपनी ने राजेश मेहता को लगभग ₹338.90 करोड़ स्थानांतरित किए, जबकि करीब ₹232.44 करोड़ वापस प्राप्त हुए। नियामक का कहना है कि धन के स्रोत को स्पष्ट किए बिना इस तरह की फंड रूटिंग प्रथम दृष्टया लेयरिंग और फंड ट्रेल छिपाने की ओर संकेत करती है।

मामले का सबसे चर्चित पहलू SEBI का वह दावा है जिसमें कंपनी के वित्तीय विवरणों में लगभग ₹15.15 लाख करोड़ के कथित गलत प्रस्तुतीकरण का आरोप लगाया गया है। नियामक के अनुसार, एक ही मूल लेनदेन को कई संस्थाओं के माध्यम से बार-बार दर्ज किया गया, जिससे राजस्व और खरीद के आंकड़े कृत्रिम रूप से बढ़े हुए दिखाई दिए। हालांकि SEBI ने स्पष्ट किया है कि ₹15.15 लाख करोड़ की राशि वास्तविक धन हस्तांतरण नहीं, बल्कि कथित रूप से गलत तरीके से दर्ज की गई लेखा प्रविष्टियों का संचयी मूल्य है।

नियामक का मानना है कि इस तरह की अकाउंटिंग पद्धति निवेशकों को कंपनी के कारोबार के वास्तविक आकार और वित्तीय स्थिति के बारे में भ्रमित कर सकती है। इसी आधार पर SEBI ने विस्तृत जांच पूरी होने तक कंपनी, उसके प्रमोटरों और कुछ संबंधित संस्थाओं पर अंतरिम प्रतिबंध लगाए हैं।

वित्तीय अपराध और साइबर जांच विशेषज्ञों का मानना है कि जटिल कॉरपोरेट संरचनाओं, लेयरिंग और बहुस्तरीय लेनदेन का उपयोग कई बार फंड ट्रेल को अस्पष्ट बनाने के लिए किया जाता है। प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि यदि किसी मामले में फंड के स्रोत और गंतव्य को छिपाने के संकेत मिलते हैं, तो नियामकीय और प्रवर्तन एजेंसियां आमतौर पर वित्तीय रिकॉर्ड, बैंकिंग चैनल और डिजिटल साक्ष्यों की गहन जांच करती हैं ताकि वास्तविक लेनदेन की प्रकृति सामने लाई जा सके।

ईडी की कार्रवाई से कंपनी पर दबाव और बढ़ गया है। माना जा रहा है कि एजेंसी अब यह जांच करेगी कि क्या SEBI द्वारा इंगित की गई कथित अनियमितताएं धन शोधन या अपराध से अर्जित आय से जुड़े किसी संभावित उल्लंघन की ओर भी संकेत करती हैं। फिलहाल कंपनी ने आरोपों को स्वीकार नहीं किया है और उपलब्ध कानूनी विकल्पों का उपयोग करने की संभावना जताई जा रही है।

जांच अभी जारी है और छापेमारी से जुड़े दस्तावेजों, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तथा वित्तीय लेनदेन के विश्लेषण के बाद मामले में आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। आने वाले दिनों में इस हाई-प्रोफाइल कॉरपोरेट जांच से जुड़े और महत्वपूर्ण खुलासे सामने आ सकते हैं।

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