पटना: बिहार की राजधानी पटना में साइबर ठगी का दायरा तेजी से बढ़ता जा रहा है और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कम पढ़े-लिखे अपराधी अब डॉक्टरों, प्रोफेसरों, बड़े कारोबारियों और यहां तक कि आईआईटी छात्रों को भी अपने जाल में फंसा रहे हैं। हालिया जांच में सामने आया है कि ये ठग आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर बेहद सुनियोजित तरीके से अपराध को अंजाम दे रहे हैं।
साइबर पुलिस की जांच में खुलासा हुआ है कि अधिकांश ठग टेलीग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म से ठगी के नए-नए तरीके सीख रहे हैं। इन प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद वीडियो और चैनलों के जरिए उन्हें लोगों को फंसाने, विश्वास जीतने और पैसे ऐंठने के तरीके सिखाए जाते हैं। इसके बाद ये अपराधी अलग-अलग बहानों—जैसे डिजिटल अरेस्ट, शेयर मार्केट निवेश, क्रिप्टोकरेंसी और फर्जी सरकारी जांच—का सहारा लेकर लोगों से लाखों रुपये ठग लेते हैं।
हैरानी की बात यह है कि गिरफ्तार किए गए अधिकांश साइबर अपराधियों की शैक्षणिक योग्यता बहुत कम है। कई आरोपी केवल मैट्रिक या 11वीं पास हैं, लेकिन उनकी कम्युनिकेशन स्किल इतनी प्रभावी होती है कि वे आसानी से पढ़े-लिखे और समझदार लोगों को भी भ्रमित कर देते हैं। पुलिस के अनुसार, ये ठग हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में धाराप्रवाह बात करते हैं, जिससे वे अपने शिकार का भरोसा जल्दी जीत लेते हैं।
पटना में साइबर ठगी के बढ़ते मामलों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर महीने औसतन करीब 206 लोग इस अपराध का शिकार हो रहे हैं। वर्ष 2025 में कुल 2602 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2026 के पहले दो महीनों में ही 284 केस सामने आ चुके हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि साइबर अपराध का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है।
हाल ही में सामने आए एक मामले में साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट का झांसा देकर पटना विश्वविद्यालय की एक सेवानिवृत्त महिला प्रोफेसर से ₹3.07 करोड़ की ठगी कर ली थी। इसी तरह डॉक्टरों, बड़े अधिकारियों और छात्रों को भी विभिन्न बहानों से निशाना बनाया गया है। पुलिस के मुताबिक कुल मामलों में से लगभग 30 प्रतिशत ठगी शेयर मार्केट निवेश और एपीके फाइल भेजकर की जा रही है।
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जांच में यह भी सामने आया है कि साइबर अपराधी गिरोह सॉफ्टवेयर तैयार कराने के लिए आईटी पेशेवरों की मदद लेते हैं। उनसे तकनीकी प्रशिक्षण लेने के बाद ये गिरोह और अधिक सक्षम हो जाते हैं और बड़े स्तर पर ठगी को अंजाम देते हैं। कई मामलों में म्यूल अकाउंट का इस्तेमाल किया जाता है, जिनमें ठगी की रकम ट्रांसफर कर तुरंत निकाल ली जाती है।
पटना के कुछ इलाके साइबर अपराधियों के लिए सुरक्षित ठिकाने बनते जा रहे हैं। नालंदा, नवादा, शेखपुरा और जमुई जैसे जिलों से आने वाले ठग यहां किराए के फ्लैट लेकर गिरोह संचालित कर रहे हैं। विशेष रूप से रामकृष्णा नगर, पत्रकार नगर और बेऊर जैसे इलाकों में इनका नेटवर्क तेजी से फैल रहा है। पिछले दो वर्षों में लगभग 80 प्रतिशत साइबर अपराधी इन्हीं क्षेत्रों से गिरफ्तार किए गए हैं।
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने इस बढ़ते खतरे पर चिंता जताते हुए कहा, “आज साइबर अपराध केवल तकनीकी ज्ञान का खेल नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी तरह से सोशल इंजीनियरिंग पर आधारित हो गया है। अपराधी लोगों की मनोविज्ञान को समझकर उन्हें जाल में फंसाते हैं। कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद ये ठग बेहद प्रशिक्षित और संगठित तरीके से काम कर रहे हैं, जो समाज के लिए गंभीर खतरा है।”
पुलिस का कहना है कि इस तरह के अपराधों से बचने के लिए लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है। किसी भी अनजान कॉल, लिंक या निवेश के प्रस्ताव पर भरोसा करने से पहले उसकी जांच जरूर करें। साथ ही, डिजिटल अरेस्ट जैसे झांसे में आने से बचें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत शिकायत करें।
यह मामला साफ तौर पर दिखाता है कि साइबर अपराध अब केवल तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक खतरा भी बन चुका है। ऐसे में जागरूकता और सतर्कता ही इस बढ़ते खतरे से बचाव का सबसे मजबूत उपाय है।
