“करीब 3,000 निवेशकों से जुटाई रकम, हाई रिटर्न का झांसा देकर फंड डायवर्ट करने का आरोप; डायरेक्टर की याचिका खारिज”

“₹90 करोड़ का निवेश घोटाला: ‘नाम मात्र’ भूमिका का दावा खारिज, कोर्ट ने कहा—सबूत ट्रायल के लिए पर्याप्त”

Roopa
By Roopa
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मुंबई। महाराष्ट्र में सामने आए करीब ₹90 करोड़ के निवेश घोटाले में अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कंपनी के एक डायरेक्टर द्वारा दायर डिस्चार्ज याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य प्रथम दृष्टया इतने पर्याप्त हैं कि मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई जाए। इस फैसले के साथ ही अब मामले में आरोप तय करने और ट्रायल शुरू होने का रास्ता साफ हो गया है।

मामला Temple Rose Real Estate Pvt Ltd से जुड़ा है, जिस पर आरोप है कि कंपनी और उसके डायरेक्टर्स ने निवेशकों को ऊंचे रिटर्न का लालच देकर बड़ी रकम जुटाई और बाद में भुगतान करने में चूक करते हुए फंड का दुरुपयोग किया। अभियोजन के अनुसार, इस स्कीम के जरिए लगभग 3,000 निवेशकों से करीब ₹90 करोड़ की राशि जुटाई गई थी।

डिस्चार्ज याचिका दायर करने वाले आरोपी मार्कस योहान थोराट ने अदालत में दावा किया था कि वह केवल “नाम मात्र” के डायरेक्टर थे और उनकी भूमिका सीमित थी। उनका कहना था कि वे केवल जमीन से जुड़े कार्यों में शामिल थे और कंपनी के वित्तीय लेनदेन या निवेश योजनाओं से उनका कोई संबंध नहीं था। हालांकि अदालत ने इस दलील को इस स्तर पर स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी 2009 से 2016 के बीच कंपनी के डायरेक्टर रहे, जो वही अवधि है जब कथित धोखाधड़ी को अंजाम दिया गया। यह भी कहा गया कि 2017 में एफआईआर दर्ज होने से पहले उनका इस्तीफा देना उन्हें कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। अदालत के अनुसार, इस तरह के तर्कों की जांच ट्रायल के दौरान ही की जा सकती है।

मामले में गवाहों के बयान भी अदालत के फैसले में अहम रहे। रिकॉर्ड में मौजूद बयानों से संकेत मिलता है कि आरोपी निवेश योजनाओं को प्रमोट करने में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे और संभावित निवेशकों से संपर्क स्थापित कर रहे थे। अदालत ने कहा कि इस तरह के बयान आरोपी की भूमिका को केवल “औपचारिक” मानने के दावे को कमजोर करते हैं।

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इसके अलावा वित्तीय दस्तावेजों ने भी आरोपी के दावे पर सवाल खड़े किए हैं। जांच में सामने आया कि आरोपी को वेतन, कमीशन और डिविडेंड के रूप में करीब ₹2.16 करोड़ का भुगतान किया गया था। अदालत ने इसे उनकी कथित सीमित भूमिका के विपरीत माना और कहा कि इतनी बड़ी रकम का भुगतान इस बात की ओर इशारा करता है कि वे कंपनी के संचालन में सक्रिय रूप से शामिल थे।

जांच के दौरान जब्त किए गए दस्तावेज—जैसे पावर ऑफ अटॉर्नी, बिक्री विलेख और अन्य ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड—भी अदालत के सामने पेश किए गए। इन दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि आरोपी कंपनी के बिजनेस ऑपरेशन, खासकर प्रॉपर्टी खरीद से जुड़े मामलों में शामिल थे। अभियोजन ने यह भी दावा किया कि निवेशकों के पैसों से कुछ संपत्तियां आरोपी के परिवार के सदस्यों के नाम पर खरीदी गईं, जो फंड के दुरुपयोग की आशंका को और मजबूत करता है।

अभियोजन पक्ष ने अदालत में दलील दी कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपी के खिलाफ “गंभीर संदेह” पैदा करते हैं, जो आरोप तय करने के लिए पर्याप्त है। अदालत ने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि इस स्तर पर केवल यह देखना होता है कि क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है, न कि अंतिम दोष या निर्दोषता का निर्धारण।

आरोपी ने यह भी तर्क दिया था कि उनके पास कंपनी में मात्र 0.49% हिस्सेदारी थी और किसी भी निवेशक ने सीधे तौर पर उनके खिलाफ आरोप नहीं लगाए हैं। हालांकि अदालत ने कहा कि इस तरह के बचाव तर्कों की जांच ट्रायल के दौरान ही की जा सकती है और इस आधार पर उन्हें अभी राहत नहीं दी जा सकती।

इस फैसले के साथ अब यह मामला अगले चरण में प्रवेश करेगा, जहां अदालत आरोप तय करेगी और विस्तृत सुनवाई के दौरान सभी साक्ष्यों और गवाहों की जांच की जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में अदालत का यह रुख निवेशकों के हितों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है और यह संदेश देता है कि कॉरपोरेट ढांचे के भीतर छिपकर जिम्मेदारी से बचना आसान नहीं है।

मामला यह भी दर्शाता है कि निवेश के नाम पर चलने वाली योजनाओं में पारदर्शिता और नियमन कितना जरूरी है। उच्च रिटर्न के लालच में निवेश करने से पहले जांच-पड़ताल करना और वैधता सुनिश्चित करना आज के समय में बेहद जरूरी हो गया है, ताकि इस तरह के वित्तीय जाल से बचा जा सके

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