मुंबई। करोड़ों रुपये के कथित निवेश घोटाले में बड़ा खुलासा करते हुए विशेष अदालत ने आरोपी पिता-पुत्र रश्मिकांत ठनावाला और दीपेन ठनावाला को 21 अप्रैल तक आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की हिरासत में भेज दिया है। जांच एजेंसियों के अनुसार, दोनों ने करीब एक दशक तक चलाए गए एक सुनियोजित निवेश नेटवर्क के जरिए ₹150 करोड़ से अधिक की रकम जुटाई। इस दौरान निवेशकों को हर महीने 2% निश्चित रिटर्न और IPO से बड़े मुनाफे का लालच दिया गया।
अदालत ने आरोपियों को हिरासत में भेजते हुए कहा कि मामले में पैसों के प्रवाह (मनी ट्रेल) को समझना, निवेश की वास्तविक स्थिति का पता लगाना और कथित तौर पर खरीदी गई संपत्तियों की पहचान करना बेहद जरूरी है। शुरुआती जांच में संकेत मिले हैं कि निवेशकों से जुटाई गई राशि का उपयोग वादे के मुताबिक निवेश में नहीं किया गया, बल्कि उसे विभिन्न कंपनियों और बैंक खातों के जरिए इधर-उधर ट्रांसफर किया गया।
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जांच एजेंसियों को यह भी आशंका है कि इस घोटाले में अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन हो सकता है। कुछ रकम विदेशों में भेजे जाने की बात सामने आई है, जिसके चलते अब विदेशी खातों और संपत्तियों की भी जांच की जा रही है। एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि निवेशकों के पैसे से किन-किन परिसंपत्तियों की खरीद की गई और उन्हें किस तरह छिपाने की कोशिश की गई।
मामले में आरोपियों को 14 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उन्हें अदालत में पेश किया गया, जहां जांच एजेंसी ने हिरासत की मांग करते हुए कहा कि कई बैंक खातों, डिजिटल उपकरणों और संबंधित कंपनियों की गहन जांच अभी बाकी है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, आरोपियों ने अलग-अलग निवेश चैनलों के जरिए रकम इकट्ठा की और उसे कई स्तरों पर घुमाया, जिससे वास्तविक लेन-देन और अंतिम गंतव्य का पता लगाना जटिल हो गया।
यह मामला उन निवेशकों की शिकायत के बाद सामने आया, जिन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें सुनियोजित तरीके से ठगा गया। शिकायतकर्ताओं ने इसे “पूर्व नियोजित और व्यवस्थित वित्तीय धोखाधड़ी” बताया और दावा किया कि कुल घोटाले की राशि ₹150 करोड़ या उससे अधिक हो सकती है। जांच में अब तक 50 से ज्यादा निवेशकों के प्रभावित होने की बात सामने आई है।
शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने निवेशकों को हर महीने 2% यानी सालाना लगभग 24% रिटर्न का भरोसा दिलाया। उन्हें बताया गया कि उनकी रकम डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग और IPO में लगाई जाएगी, जिससे लगातार मुनाफा मिलता रहेगा। शुरुआत में कुछ निवेशकों को समय पर भुगतान भी किया गया, जिससे भरोसा मजबूत हो सके। लेकिन वर्ष 2025 के अंत तक भुगतान पूरी तरह बंद हो गया और निवेशकों को बार-बार आश्वासन देकर टालमटोल किया जाने लगा।
पीड़ितों का आरोप है कि जब उन्होंने अपनी निवेशित राशि वापस मांगनी शुरू की, तो उन्हें अलग-अलग बहाने और नई तारीखें दी जाती रहीं। इस दौरान आरोपियों ने निवेशकों को यह विश्वास दिलाने के लिए फर्जी डिजिटल प्लेटफॉर्म और डैशबोर्ड का इस्तेमाल किया, जिनमें उनके निवेश और मुनाफे की झूठी जानकारी दिखाई जाती थी।
जांच में यह भी सामने आया है कि निवेशकों को दिखाए गए कई ऑनलाइन इंटरफेस और बैंकिंग प्लेटफॉर्म वास्तव में क्लोन या फर्जी थे, जिनका किसी वास्तविक वित्तीय सिस्टम से कोई संबंध नहीं था। इन नकली प्लेटफॉर्म्स के जरिए निवेशकों को यह भरोसा दिलाया गया कि उनका पैसा सुरक्षित है और लगातार बढ़ रहा है, जबकि हकीकत में रकम को अन्य खातों में ट्रांसफर किया जा रहा था।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मामले में “धन के दुरुपयोग और ट्रेल को छिपाने” के पर्याप्त संकेत हैं। ऐसे में विस्तृत पूछताछ और डिजिटल व वित्तीय साक्ष्यों की जांच के लिए आरोपियों की हिरासत जरूरी है। अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि इस स्तर पर जांच को आगे बढ़ाने के लिए हिरासत अनिवार्य है।
फिलहाल जांच एजेंसियां बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल डेटा, निवेश चैनलों और संबंधित कंपनियों की कड़ियों को जोड़ने में जुटी हैं। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि इस पूरे नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल हैं और क्या अन्य निवेशकों को भी इसी तरह निशाना बनाया गया।
यह मामला एक बार फिर यह दिखाता है कि ऊंचे और निश्चित रिटर्न के लालच में निवेश करना कितना जोखिम भरा हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि निवेश से पहले योजना की विश्वसनीयता और पारदर्शिता की जांच करना बेहद जरूरी है।
आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना है, क्योंकि जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क की परत-दर-परत जांच कर रही हैं और इससे जुड़े अन्य संभावित आरोपियों की तलाश में भी जुटी हैं
