लखनऊ। राजधानी के पीजीआई थाना क्षेत्र में एक बड़े वित्तीय गड़बड़ी और कथित गबन का मामला सामने आया है, जहां एक इलेक्ट्रॉनिक कारोबारी ने अपने ही शोरूम में कार्यरत नौ कर्मचारियों पर ₹8.55 करोड़ के गबन का आरोप लगाया है। कारोबारी का दावा है कि नियमित ऑडिट के दौरान बिक्री, स्टॉक और खातों में गंभीर अनियमितताएं सामने आईं, जिसके बाद पूरे मामले की आंतरिक जांच कराई गई। जांच में कथित तौर पर करोड़ों रुपये की वित्तीय हेराफेरी उजागर होने के बाद कोर्ट की शरण ली गई, जिसके आदेश पर पीजीआई पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
जानकारी के अनुसार, साउथ सिटी निवासी हेमंत कुमार का उतरेठिया बाजार में इलेक्ट्रॉनिक सामान का बड़ा शोरूम संचालित होता है। कारोबार में मोबाइल फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और अन्य महंगे उपकरणों की बिक्री की जाती है। शोरूम के दैनिक संचालन, स्टॉक प्रबंधन, बिक्री रिकॉर्ड और नकदी के रखरखाव की जिम्मेदारी मैनेजर विवेक यादव सहित अन्य कर्मचारियों को सौंपी गई थी।
कारोबारी के मुताबिक, कुछ समय पहले व्यापारिक रिकॉर्ड की नियमित समीक्षा के दौरान खातों और स्टॉक से जुड़े आंकड़ों में असामान्य अंतर दिखाई दिया। इसके बाद विस्तृत ऑडिट कराने का निर्णय लिया गया। ऑडिट रिपोर्ट सामने आने पर कथित तौर पर ऐसे तथ्य उजागर हुए जिन्होंने प्रबंधन को भी हैरान कर दिया। रिपोर्ट में लगभग ₹8.55 करोड़ की वित्तीय गड़बड़ी और स्टॉक संबंधी अनियमितताओं का उल्लेख किया गया।
शिकायत के अनुसार, गहन जांच के दौरान यह पाया गया कि बिक्री से प्राप्त होने वाली पूरी राशि कंपनी के आधिकारिक खातों में जमा नहीं की गई। आरोप है कि कुछ लेनदेन को रिकॉर्ड में दर्शाने के बावजूद संबंधित रकम बैंक खातों तक नहीं पहुंची। इसके अलावा शोरूम के स्टॉक और वास्तविक उपलब्ध माल के बीच भी बड़ा अंतर पाया गया। विशेष रूप से मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य उच्च मूल्य वाले इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की संख्या रिकॉर्ड की तुलना में काफी कम मिली।
कारोबारी ने आरोप लगाया है कि इस कथित हेराफेरी को छिपाने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और लेखा पुस्तकों में गलत प्रविष्टियां दर्ज की गईं। जांच के दौरान कथित रूप से ऐसे रिकॉर्ड सामने आए जिनमें बिक्री, स्टॉक और नकदी से संबंधित विवरण वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाते थे। आरोप है कि व्यवस्थित तरीके से रिकॉर्ड में बदलाव कर वित्तीय अनियमितताओं को लंबे समय तक छिपाने का प्रयास किया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कारोबारी ने पहले आंतरिक स्तर पर तथ्यों की पुष्टि कराई और बाद में कानूनी कार्रवाई का रास्ता अपनाया। पुलिस में सीधे मामला दर्ज न होने पर उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अदालत के आदेश के बाद पीजीआई पुलिस ने आरोपित कर्मचारियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली है और मामले की जांच शुरू कर दी गई है।
जांच एजेंसियां अब शोरूम के वित्तीय रिकॉर्ड, बैंकिंग लेनदेन, बिक्री रजिस्टर, डिजिटल डेटा और स्टॉक प्रबंधन से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल कर रही हैं। यह भी देखा जा रहा है कि कथित गड़बड़ियां कितने समय से चल रही थीं और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका रही। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या कथित रूप से गायब हुई रकम और उपकरणों का कोई वित्तीय ट्रेल उपलब्ध है।
महत्वपूर्ण साइबर एवं वित्तीय अपराध मामलों में विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों में डिजिटल लेखा प्रणाली और नियमित ऑडिट वित्तीय धोखाधड़ी का पता लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि कॉर्पोरेट और व्यापारिक संस्थानों में वित्तीय अपराध अक्सर रिकॉर्ड में हेरफेर, फर्जी एंट्री और स्टॉक मैनेजमेंट की कमजोरियों का फायदा उठाकर किए जाते हैं। ऐसे मामलों में डिजिटल डेटा, बैंकिंग रिकॉर्ड और ऑडिट रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित होते हैं।
फिलहाल पुलिस मामले से जुड़े सभी पहलुओं की जांच कर रही है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह राजधानी में हाल के वर्षों के सबसे बड़े निजी कारोबारी गबन मामलों में से एक माना जा सकता है। जांच पूरी होने के बाद ही कथित वित्तीय अनियमितताओं की वास्तविक सीमा और जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका स्पष्ट हो सकेगी।
