पुणे के चर्चित केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच में पुलिस अब ‘गेट एनालिसिस’ (Gait Analysis) तकनीक के इस्तेमाल पर गंभीरता से विचार कर रही है। यह वही फोरेंसिक तकनीक है, जिसका उपयोग वर्ष 2017 में पत्रकार गौरी लंकेश हत्याकांड की जांच के दौरान भी किया गया था। जांच अधिकारियों का मानना है कि जब संदिग्ध चेहरा छिपा लेते हैं या पारंपरिक पहचान के तरीके सीमित हो जाते हैं, तब चाल-ढाल का वैज्ञानिक विश्लेषण जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसियां मामले में उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज का विस्तृत विश्लेषण कर रही हैं। यदि आवश्यकता पड़ी तो संदिग्धों की चाल, शरीर की बनावट, चलने की गति, हाथ-पैरों की गतिविधि और अन्य शारीरिक विशेषताओं की तुलना घटनास्थल के फुटेज से की जा सकती है।
गौरी लंकेश हत्याकांड में भी हमलावर का चेहरा हेलमेट से ढका होने के कारण पारंपरिक चेहरे की पहचान संभव नहीं थी। उस मामले में विशेष जांच दल ने आरोपी की गिरफ्तारी के बाद घटनास्थल का पुनर्निर्माण कराया और उसकी चाल-ढाल का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार कर उसे सीसीटीवी फुटेज से मिलाया था। इस विश्लेषण ने जांच में महत्वपूर्ण सहायक साक्ष्य उपलब्ध कराए थे।
इसी प्रकार वर्ष 2021 के मुंबई के साकी नाका दुष्कर्म एवं हत्या मामले की जांच में भी गेट एनालिसिस तकनीक का उपयोग किया गया था। फोरेंसिक विशेषज्ञों का कहना है कि पहचान छिपाने की कोशिश करने वाले संदिग्धों से जुड़े मामलों में यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, गेट एनालिसिस के दौरान संदिग्ध की मौजूदगी में घटनास्थल का पुनर्निर्माण किया जाता है। इसके बाद उसकी चाल, शरीर की मुद्रा, हाथों की गतिविधि, कदमों की लंबाई, ऊंचाई, शरीर की संरचना तथा अन्य बायोमैकेनिकल विशेषताओं का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार किया जाता है। इन आंकड़ों की तुलना घटनास्थल पर उपलब्ध वीडियो या सीसीटीवी फुटेज से की जाती है।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि आधुनिक आपराधिक जांच में डिजिटल और फोरेंसिक साक्ष्यों का एकीकृत विश्लेषण अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। उनके अनुसार, गेट एनालिसिस जैसी वैज्ञानिक तकनीकें सीसीटीवी, डिजिटल फोरेंसिक, मोबाइल लोकेशन, डीएनए और अन्य भौतिक साक्ष्यों के साथ मिलकर जांच को अधिक मजबूत और विश्वसनीय बनाती हैं। उन्होंने कहा कि अदालत में किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए बहुस्तरीय वैज्ञानिक साक्ष्यों का परस्पर समर्थन महत्वपूर्ण होता है।
हालांकि, फोरेंसिक विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि गेट एनालिसिस को सामान्यतः अकेले निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जाता। इसका उपयोग अन्य वैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों—जैसे सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल फोरेंसिक, डीएनए, फिंगरप्रिंट और गवाहों के बयान—की पुष्टि के लिए किया जाता है।
जांच से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि घटनास्थल के वीडियो की गुणवत्ता पर्याप्त हो और संदिग्ध की चाल स्पष्ट दिखाई दे, तो गेट एनालिसिस जांच की दिशा तय करने और संदिग्ध की पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। फिलहाल केतन अग्रवाल हत्याकांड में पुलिस उपलब्ध सभी वैज्ञानिक और डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण कर रही है तथा जांच आगे बढ़ रही है।
