केरल में मेडिकल टूरिज्म की आड़ में कथित अंग तस्करी रैकेट को लेकर ED ने कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाकर दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य जब्त किए हैं।

मेडिकल टूरिज्म की आड़ में कथित अंग तस्करी रैकेट का खुलासा: ईडी की जांच में डोनर्स के शोषण और करोड़ों के लेनदेन के आरोप

Team The420
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केरल में मेडिकल टूरिज्म की आड़ में संचालित एक कथित अंग तस्करी नेटवर्क को लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच ने कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। एजेंसी का दावा है कि यह गिरोह आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद लोगों को निशाना बनाकर उनके अंग हासिल करता था और फिर भारी रकम लेकर जरूरतमंद मरीजों को उपलब्ध कराता था। जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क का संचालन सुनियोजित तरीके से किया जा रहा था, जिसमें बिचौलियों, एजेंटों और कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले लोगों की भी भूमिका सामने आई है।

मामले में ईडी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कार्रवाई करते हुए हाल ही में राज्य के विभिन्न स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया। जांच के दौरान अस्पतालों सहित नौ स्थानों पर छापेमारी की गई, जहां से अंग प्रत्यारोपण से जुड़े संदिग्ध दस्तावेज, डिजिटल साक्ष्य और वित्तीय लेनदेन से संबंधित रिकॉर्ड बरामद किए गए। एजेंसी ने कथित अपराध से अर्जित आय का पता लगाने के लिए आरोपियों की अचल संपत्तियों और बैंक खातों पर भी कार्रवाई की है।

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यह कार्रवाई उस पुलिस जांच के बाद की गई जिसमें कथित अंग तस्करी गिरोह का भंडाफोड़ किया गया था। मामले में अब तक कई प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी हैं और मुख्य आरोपी नजीब समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि गिरोह अंगदान और मेडिकल टूरिज्म की वैध प्रक्रियाओं का इस्तेमाल एक आवरण के रूप में कर रहा था, जबकि पर्दे के पीछे अवैध अंग प्रत्यारोपण और वित्तीय लाभ का नेटवर्क संचालित किया जा रहा था।

प्रारंभिक जांच के अनुसार, मुख्य आरोपी मोहम्मद नजीब और उसकी सहयोगी रशीदा एए ने कथित तौर पर अपनी कंपनी ‘कल्लाथारस मेडिकल टूरिज्म प्राइवेट लिमिटेड’ के माध्यम से वर्ष 2021 से 2026 के बीच इस नेटवर्क का संचालन किया। जांच में सामने आया है कि एजेंटों और बिचौलियों का एक संगठित नेटवर्क आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों की पहचान करता था और उन्हें अंग दान करने के बदले ₹5 लाख से ₹15 लाख तक देने का प्रस्ताव दिया जाता था।

वहीं दूसरी ओर, अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता वाले लोगों से कथित तौर पर ₹20 लाख से ₹35 लाख या उससे अधिक की राशि वसूली जाती थी। जांचकर्ताओं का मानना है कि डोनर्स और प्राप्तकर्ताओं के बीच इस भारी अंतर से नेटवर्क को बड़ा आर्थिक लाभ पहुंच रहा था। इसी वित्तीय अंतर और धन के प्रवाह की जांच अब धन शोधन के पहलू से भी की जा रही है।

जांच में यह भी सामने आया है कि कथित तौर पर अवैध प्रत्यारोपण प्रक्रियाओं को वैध दिखाने के लिए व्यापक स्तर पर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। अधिकारियों के अनुसार, एर्नाकुलम क्षेत्र में कुछ स्थानीय डीटीपी सेंटरों और डिजिटल स्टूडियो की मदद से परोपकार प्रमाण पत्र, जनप्रतिनिधियों के सिफारिशी पत्र, आधार कार्ड, राशन कार्ड और अन्य आवश्यक पहचान दस्तावेजों की जालसाजी की गई। इन दस्तावेजों का उपयोग यह दिखाने के लिए किया जाता था कि अंगदान कानूनी और मानवीय आधार पर किया जा रहा है।

जांच एजेंसियों का दावा है कि इन्हीं कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर एर्नाकुलम के कई प्रमुख अस्पतालों में प्रत्यारोपण प्रक्रियाएं पूरी कराई गईं। हालांकि जांच अभी जारी है और विभिन्न संस्थानों तथा व्यक्तियों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल रिकॉर्ड, बैंकिंग ट्रेल और दस्तावेजी साक्ष्यों का विश्लेषण कर पूरे नेटवर्क की संरचना समझने का प्रयास किया जा रहा है।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि संगठित अपराधी गिरोह अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर अवैध कमाई के रास्ते तलाशते हैं। उनके अनुसार, जब फर्जी पहचान, जाली दस्तावेज और वित्तीय नेटवर्क एक साथ इस्तेमाल किए जाते हैं, तो ऐसे मामलों की जांच में डिजिटल और वित्तीय साक्ष्य बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

फिलहाल ईडी और अन्य जांच एजेंसियां मामले की विभिन्न कड़ियों को जोड़ने में जुटी हैं। यदि आरोप साबित होते हैं, तो यह मामला केवल अंग तस्करी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संगठित धोखाधड़ी, जालसाजी, धन शोधन और मानव शोषण जैसे गंभीर अपराधों का भी उदाहरण बन सकता है।

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