कोच्चि। केरल से संचालित एक कथित साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क की जांच अब अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी के संभावित मामले तक पहुंच गई है। कोच्चि सिटी साइबर क्राइम पुलिस द्वारा की जा रही जांच के दौरान ऐसे संकेत मिले हैं कि विदेश में आकर्षक नौकरी दिलाने के नाम पर लोगों को कंबोडिया भेजने का एक संगठित नेटवर्क सक्रिय हो सकता है। मामले की गंभीरता और संभावित अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन को देखते हुए केंद्रीय एजेंसियों के भी जांच में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।
जांच का केंद्र पलक्कड़ निवासी अब्दुल रहमान है, जिसे पुलिस कथित साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क का प्रमुख संचालक मान रही है। शुरुआती जांच साइबर अपराधों तक सीमित थी, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और अन्य साक्ष्यों की पड़ताल के दौरान ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने मामले को मानव तस्करी और अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क की दिशा में मोड़ दिया है।
जांच अधिकारियों के अनुसार, करीब 100 लोगों को कथित तौर पर विदेश में रोजगार दिलाने का झांसा देकर भर्ती किया गया। इनमें कई मलयाली नागरिकों के अलावा महिलाएं भी शामिल बताई जा रही हैं। पीड़ितों को बेहतर वेतन, सुरक्षित रोजगार और विदेश में उज्ज्वल भविष्य का सपना दिखाकर नेटवर्क के संपर्क में लाया गया। अब पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि क्या केरल के अलावा अन्य राज्यों के लोग भी इसी तरीके से जाल में फंसाए गए थे।
मामले की जांच कर रही टीम को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य मिले हैं। पुलिस ने आरोपी से जुड़े एक लैपटॉप से नौकरी के इच्छुक उम्मीदवारों के ऑनलाइन वीडियो इंटरव्यू से संबंधित दृश्य बरामद किए हैं। जांचकर्ताओं का मानना है कि इन इंटरव्यू का उपयोग संभावित उम्मीदवारों की पहचान और चयन प्रक्रिया के हिस्से के रूप में किया जाता था।
इसके अलावा एक आईफोन भी जब्त किया गया है, जिसमें इसी प्रकार की सामग्री मिलने की बात कही जा रही है। जब्त उपकरणों को फोरेंसिक विश्लेषण के लिए भेजा गया है। वहीं एक अन्य मोबाइल फोन, जिसका कथित तौर पर आरोपी उपयोग करता था, अभी तक बरामद नहीं हो सका है। अधिकारियों को उम्मीद है कि उस डिवाइस से नेटवर्क के संचालन और विदेशी संपर्कों के बारे में और जानकारी मिल सकती है।
प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि चयनित उम्मीदवारों को सीधे कंबोडिया नहीं भेजा जाता था। कथित तौर पर उन्हें पहले थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में विजिट वीजा पर भेजा जाता था। इसके बाद उन्हें सड़क मार्ग से कंबोडिया की सीमा तक पहुंचाया जाता था। जांच एजेंसियां इस पूरे यात्रा मार्ग और उसमें शामिल व्यक्तियों की भूमिका की पड़ताल कर रही हैं।
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सूत्रों के अनुसार, सीमा पार कराने के लिए स्थानीय स्तर पर रिश्वत दिए जाने की आशंका भी जांच के दायरे में है। पुलिस यह सत्यापित करने का प्रयास कर रही है कि क्या सीमा पार आवाजाही को आसान बनाने के लिए किसी संगठित तंत्र का इस्तेमाल किया गया था। यदि ऐसा पाया जाता है, तो मामला कई देशों में फैले एक बड़े नेटवर्क की ओर इशारा कर सकता है।
जांच में सामने आया सबसे गंभीर आरोप यह है कि पीड़ितों के पासपोर्ट कथित तौर पर उनसे ले लिए जाते थे। अधिकारियों को आशंका है कि पहचान और यात्रा दस्तावेज छीन लेने के बाद पीड़ितों की स्वतंत्र आवाजाही सीमित हो जाती थी और वे बाहरी मदद लेने या अपने देश लौटने में असमर्थ हो जाते थे। इस पहलू को मानव तस्करी के मामलों में महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।
पुलिस अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि कंबोडिया पहुंचने के बाद पीड़ितों से किस प्रकार का काम कराया जाता था। जांच इस दिशा में भी आगे बढ़ रही है कि कहीं उन्हें साइबर ठगी केंद्रों, ऑनलाइन फ्रॉड ऑपरेशनों या अन्य शोषणकारी गतिविधियों में शामिल होने के लिए मजबूर तो नहीं किया गया। हाल के वर्षों में दक्षिण-पूर्व एशिया से ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें फर्जी नौकरी के बहाने लोगों को साइबर अपराध केंद्रों तक पहुंचाया गया था।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, साइबर अपराध और मानव तस्करी के नेटवर्क अब पहले से कहीं अधिक संगठित और तकनीक-आधारित हो गए हैं। उन्होंने कहा कि अपराधी सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप और ऑनलाइन जॉब पोर्टलों का इस्तेमाल कर लोगों को विदेश में रोजगार का झांसा देते हैं। ऐसे प्रस्तावों की सत्यता जांचे बिना किसी भी विदेशी नौकरी के अवसर पर भरोसा करना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।
फिलहाल जांच जारी है और अधिकारी डिजिटल साक्ष्यों, वित्तीय लेनदेन, विदेशी संपर्कों तथा संभावित पीड़ितों के बयानों का विश्लेषण कर रहे हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि आगे की पड़ताल से इस कथित नेटवर्क के आकार, संचालन पद्धति और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शनों की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है।
