नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित डीपफेक तकनीक अब केवल सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो बनाने तक सीमित नहीं रह गई है। यह खतरा अब बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और बीमा (बीएफएसआई) क्षेत्र तक पहुंच चुका है, जहां इसका इस्तेमाल वीडियो केवाईसी और पहचान सत्यापन प्रक्रियाओं को चकमा देने के लिए किया जा रहा है। उद्योग विशेषज्ञों और साइबर सुरक्षा पेशेवरों का कहना है कि कम लागत में उपलब्ध ओपन-सोर्स एआई मॉडल और उन पर आधारित विशेष एप्लिकेशन धोखेबाजों को पहले से अधिक परिष्कृत और प्रभावी तरीके से वित्तीय अपराध करने में सक्षम बना रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान दौर के डीपफेक इतने वास्तविक दिखाई देते हैं कि उन्हें सामान्य तस्वीरों और वीडियो से अलग पहचानना बेहद कठिन हो गया है। यही वजह है कि वित्तीय संस्थानों की वीडियो आधारित ग्राहक सत्यापन प्रणालियां अब नए प्रकार के साइबर खतरों का सामना कर रही हैं। कई मामलों में अपराधी नकली पहचान, छेड़छाड़ किए गए दस्तावेज और डीपफेक वीडियो का उपयोग कर वैध ग्राहक के रूप में खुद को प्रस्तुत करने में सफल हो रहे हैं।
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उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ऐसे मामलों ने वित्तीय क्षेत्र में वास्तविक नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। कुछ मामलों में वीडियो केवाईसी और अंडरराइटिंग प्रक्रियाओं को धोखा देकर करोड़ों रुपये की वित्तीय धोखाधड़ी को अंजाम दिया गया। एक मामले में कथित तौर पर एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी को ₹15 करोड़ से ₹20 करोड़ तक का नुकसान हुआ। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि डीपफेक अब केवल तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि संगठित वित्तीय अपराध का एक प्रभावी हथियार बनता जा रहा है।
तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकांश अपराधी अत्याधुनिक और महंगे एआई मॉडल का उपयोग नहीं करते। इसके बजाय वे अपेक्षाकृत छोटे ओपन-सोर्स मॉडल का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें सामान्य गेमिंग कंप्यूटरों पर भी चलाया जा सकता है। यही कारण है कि डीपफेक तैयार करने की लागत लगातार कम होती जा रही है। ऐसे टूल्स विभिन्न ऑनलाइन मंचों और गुप्त डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से साझा किए जाते हैं, जिससे साइबर अपराधियों के लिए इन तक पहुंच आसान हो जाती है।
डीपफेक इंजेक्शन तकनीक इस खतरे को और गंभीर बनाती है। इसमें किसी डिवाइस या कैमरा फीड में पहले से तैयार नकली तस्वीर या वीडियो डाला जाता है, जिससे पहचान सत्यापन प्रणाली को भ्रमित किया जा सके। कई मामलों में ऐसे डीपफेक लाइवनेस जांच को भी पार कर लेते हैं। लाइवनेस जांच का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि कैमरे के सामने मौजूद व्यक्ति वास्तविक है, लेकिन उन्नत डीपफेक तकनीक इस सुरक्षा स्तर को भी चुनौती दे रही है।
बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) ने भी चेतावनी जारी की है। एजेंसी ने कहा है कि अपराधी एआई आधारित तकनीकों का इस्तेमाल कर मौजूदा साइबर सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने की कोशिश कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में वित्तीय संस्थानों को पारंपरिक पहचान सत्यापन प्रक्रियाओं से आगे बढ़कर बहु-स्तरीय सुरक्षा उपाय अपनाने होंगे।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि डीपफेक आधारित वित्तीय धोखाधड़ी आने वाले वर्षों में साइबर अपराध की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन सकती है। उनके अनुसार, अपराधी अब केवल फिशिंग लिंक या ओटीपी धोखाधड़ी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एआई और सोशल इंजीनियरिंग को मिलाकर ऐसे हमले तैयार कर रहे हैं जो आम नागरिकों और वित्तीय संस्थानों दोनों को भ्रमित कर सकते हैं। प्रो. सिंह का मानना है कि वीडियो केवाईसी, डिजिटल ऑनबोर्डिंग और रिमोट पहचान सत्यापन प्रक्रियाओं में एआई-आधारित सुरक्षा जांच और व्यवहार विश्लेषण को शामिल करना समय की आवश्यकता बन गया है।
इस चुनौती से निपटने के लिए कई तकनीकी कंपनियां डीपफेक पहचान प्रणाली विकसित कर रही हैं। इन प्रणालियों का उद्देश्य तस्वीरों, वीडियो और दस्तावेजों का विश्लेषण कर यह पता लगाना है कि उनमें कृत्रिम हस्तक्षेप हुआ है या नहीं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि एआई आधारित हमलों और सुरक्षा तकनीकों के बीच यह प्रतिस्पर्धा लगातार तेज होती जा रही है।
भारतीय रिजर्व बैंक की हालिया रिपोर्ट भी वित्तीय क्षेत्र के लिए चिंता बढ़ाती है। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में बैंकिंग उद्योग ने ₹48,021 करोड़ की धोखाधड़ी दर्ज की, जो पिछले वर्ष के ₹32,803 करोड़ की तुलना में 46.4 प्रतिशत अधिक है। हालांकि इन मामलों में सभी सीधे डीपफेक से जुड़े नहीं हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पहचान आधारित धोखाधड़ी और डिजिटल अपराधों में नई तकनीकों की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह खतरा केवल बैंकिंग क्षेत्र तक सीमित नहीं है। ई-कॉमर्स, क्विक कॉमर्स, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, डेटिंग ऐप और डिजिटल भुगतान सेवाएं भी डीपफेक आधारित धोखाधड़ी के जोखिम का सामना कर रही हैं। ऐसे में साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की सलाह है कि संस्थान अपनी पहचान सत्यापन प्रक्रियाओं को मजबूत करें और उपयोगकर्ता भी डिजिटल दस्तावेजों तथा ऑनलाइन पहचान संबंधी गतिविधियों में अतिरिक्त सतर्कता बरतें।
