कर्नाटक के बहुचर्चित बिटकॉइन घोटाले में राज्य सीआईडी की विशेष जांच टीम (SIT) ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ दर्ज दो मामलों में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है। यह कदम राज्य सरकार द्वारा संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति (Prosecution Sanction) देने से इनकार किए जाने के बाद उठाया गया। हालांकि, मामले में निजी साइबर विशेषज्ञ के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया है और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की मनी लॉन्ड्रिंग जांच अलग से जारी है।
सीआईडी की बिटकॉइन मामलों की एसआईटी ने 1 जुलाई को जनवरी 2024 में दर्ज भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामले में चार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ ‘बी रिपोर्ट’ दाखिल करते हुए जांच बंद करने की सिफारिश की। वहीं, बेंगलुरु सेंट्रल क्राइम ब्रांच (CCB) की सहायता के लिए नियुक्त किए गए निजी साइबर विशेषज्ञ के. एस. संतोष कुमार के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया है।
एसआईटी ने अगस्त 2023 में दर्ज एक अन्य प्राथमिकी में भी क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इस मामले में आरोप था कि हैकर श्रीकृष्ण रमेश उर्फ श्रीकी से बरामद लैपटॉप और मोबाइल फोन जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के साथ कथित छेड़छाड़ की गई थी। जांच एजेंसी के अनुसार, सरकार द्वारा अभियोजन की अनुमति नहीं दिए जाने के कारण संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध आगे की कानूनी कार्रवाई संभव नहीं हो सकी।
यह विशेष जांच दल जून 2023 में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद गठित किया गया था। जांच का उद्देश्य 2019 से 2023 के दौरान चर्चित हैकिंग मामलों की जांच में कथित अनियमितताओं, भ्रष्टाचार और साक्ष्यों से छेड़छाड़ के आरोपों की पड़ताल करना था।
एसआईटी की जांच के दौरान आरोप लगाया गया था कि कुछ पुलिस अधिकारियों ने श्रीकी और उसके सहयोगियों के खिलाफ दर्ज मामलों को कमजोर करने के बदले कथित रूप से अवैध लाभ प्राप्त किए। इसके अतिरिक्त, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के डेटा से छेड़छाड़, दस्तावेज नष्ट करने, अवैध हिरासत और जांच प्रक्रिया में गंभीर प्रक्रियागत खामियों के भी आरोप लगाए गए थे।
जनवरी 2024 में दर्ज मामले में एसआईटी ने निजी साइबर विशेषज्ञ के. एस. संतोष कुमार सहित पांच लोगों को आरोपी बनाया था। जांच में आरोप लगाया गया कि साइबर विशेषज्ञ ने जांच के दौरान एक क्रिप्टो वॉलेट तक अवैध पहुंच बनाकर लगभग ₹1.83 लाख मूल्य के बिटकॉइन अपने वॉलेट में ट्रांसफर किए। इसी मामले में उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था।
जांच के दौरान कई प्रक्रियागत कमियां भी सामने आईं। एसआईटी के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लॉगिन और पासवर्ड का समुचित रिकॉर्ड नहीं रखा गया, कुछ आरोपियों को कथित रूप से अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और यहां तक कि जांच के दौरान हैकर को कथित तौर पर लगभग ₹60,000 मूल्य का लैपटॉप उपलब्ध कराया गया, जिससे गंभीर सवाल खड़े हुए।
इस पूरे प्रकरण की वित्तीय जांच प्रवर्तन निदेशालय भी कर रहा है। एसआईटी द्वारा डिजिटल और वित्तीय ऑडिट रिपोर्ट उपलब्ध कराने के बाद ईडी ने कथित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की जांच तेज की। इसी क्रम में मई 2026 में हैकर श्रीकी, उसके अकाउंटेंट रॉबिन खंडेलवाल और सहयोगी सुनीश हेगड़े को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत गिरफ्तार किया गया। इसके बाद 7 जुलाई 2026 को ईडी ने अपनी चार्जशीट भी अदालत में दाखिल की।
ईडी का आरोप है कि श्रीकी और उसके सहयोगी वर्षों तक विभिन्न ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म, क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज और सरकारी ई-प्रोक्योरमेंट सिस्टम को निशाना बनाकर वर्चुअल डिजिटल एसेट (VDA) और अन्य डिजिटल संपत्तियों की चोरी करते रहे। जांच एजेंसी के अनुसार, चोरी की गई संपत्तियों को कई बैंक खातों, क्रिप्टो एक्सचेंजों और अन्य वित्तीय माध्यमों से घुमाकर मनी लॉन्ड्रिंग की गई।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े अपराधों की जांच में डिजिटल साक्ष्यों की अखंडता (Integrity), फॉरेंसिक चेन ऑफ कस्टडी और पारदर्शी जांच प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में प्रक्रियागत चूक या साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका न केवल अभियोजन को कमजोर करती है बल्कि संगठित साइबर अपराध के खिलाफ कार्रवाई की विश्वसनीयता पर भी असर डालती है।
