पीड़ित ने ₹1.7 लाख फिरौती देकर लौटने के बाद खोले राज, फर्जी नौकरी के बहाने विदेश भेजकर साइबर फ्रॉड में जबरन कराया जाता था काम

विदेशी नौकरी के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा: कंबोडिया में साइबर ठगी नेटवर्क को युवकों की ‘बिक्री’, दो एजेंट गिरफ्तार

Roopa
By Roopa
4 Min Read

कानपुर में पुलिस ने एक संगठित अंतरराष्ट्रीय रैकेट का भंडाफोड़ किया है, जो बेरोजगार युवाओं को विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर कंबोडिया भेजकर साइबर ठगी नेटवर्क में धकेल देता था। इस मामले में दो एजेंट मो. आमस और मो. फैसल वारिस को गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि ये लोग ई-कॉमर्स सेक्टर में 1.5 लाख रुपये मासिक वेतन का झांसा देकर युवकों से तीन लाख रुपये तक वसूलते थे और फिर उन्हें विदेश भेज देते थे।

जांच में सामने आया है कि पीड़ितों को लखनऊ और बैंकॉक के रास्ते कंबोडिया पहुंचाया जाता था, जहां उन्हें होटल जैसे दिखने वाले अवैध कॉल सेंटरों में रखा जाता था। इन जगहों को अलग-अलग ‘स्टूडियो’ में बांटकर साइबर ठगी के विभिन्न मॉड्यूल चलाए जाते थे, जिनमें फर्जी सोशल मीडिया प्रोफाइल, रोमांटिक चैट, हनी ट्रैप और निवेश घोटाले शामिल थे।

पीड़ित नावेद ने बयान में बताया कि उसे एक प्रतिष्ठित विदेशी कंपनी में नौकरी का लालच दिया गया था, लेकिन कंबोडिया पहुंचते ही उसे साइबर फ्रॉड की ट्रेनिंग दी गई। विरोध करने पर उसे कमरे में बंद रखा जाता था और भोजन तक सीमित कर दिया जाता था। उसके साथ भारत, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका के कई युवक-युवतियां भी इसी तरह फंसे हुए थे, जिन्हें जबरन ठगी के लिए मजबूर किया जाता था।

पुलिस के अनुसार इस गिरोह ने कम से कम छह लोगों को विदेश भेजा था, जिनमें से तीन किसी तरह भारत लौट आए हैं। पूरा नेटवर्क एक फरार सरगना इरफान के निर्देशन में संचालित हो रहा था, जिसकी तलाश में दबिश दी जा रही है। शुरुआती जांच में यह भी सामने आया है कि यह गिरोह हर शिकार के बदले एजेंटों को लगभग 65 हजार रुपये तक कमीशन देता था।

FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference

पीड़ितों को एक तय सिस्टम के तहत साइबर ठगी में लगाया जाता था। उन्हें रोजाना टारगेट दिया जाता था और नाकाम रहने पर मानसिक प्रताड़ना, अलगाव और धमकी जैसी सजा दी जाती थी। इस पूरे नेटवर्क को अंतरराष्ट्रीय ‘साइबर स्लेवरी’ का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें मानव तस्करी और डिजिटल अपराध दोनों साथ चलते हैं।

इस मामले पर साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रोफेसर त्रिवेणी सिंह ने कहा, “यह एक बेहद संगठित और खतरनाक मॉडल है, जिसमें मानव तस्करी को साइबर अपराध से जोड़ दिया गया है। पहले युवाओं को फर्जी नौकरी का लालच देकर विदेश भेजा जाता है, फिर उनके पासपोर्ट और पहचान पत्र जब्त कर उन्हें साइबर ठगी के लिए मजबूर किया जाता है। यह आधुनिक डिजिटल गुलामी का रूप है, जिसे रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित कार्रवाई जरूरी है।”

जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह सोशल मीडिया पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर लोगों को फंसाता था। इन प्रोफाइल में चोरी की तस्वीरों और एआई-जनरेटेड इमेज का इस्तेमाल कर उन्हें वास्तविक दिखाया जाता था। बातचीत के दौरान पहले दोस्ती, फिर भावनात्मक जुड़ाव और अंत में निवेश का लालच देकर लोगों को शिकार बनाया जाता था।

पुलिस ने इस कार्रवाई में मोबाइल फोन, सिम कार्ड, चैट रिकॉर्ड और भर्ती से जुड़े दस्तावेज बरामद किए हैं। इनकी जांच से पूरे नेटवर्क के वित्तीय लेन-देन और विदेशी संपर्कों की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह गिरोह कई राज्यों में सक्रिय हो सकता है और इसकी परतें लगातार खुल रही हैं।

मामले की आगे जांच जारी है और एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क से और कितने लोग जुड़े हैं और कितने युवाओं को इसी तरह विदेश भेजकर साइबर ठगी में धकेला गया है।

हमसे जुड़ें

Share This Article