कानपुर के जाजमऊ की एक निजी फर्म ने अपने अकाउंटेंट पर fake transport bills के जरिए ₹2 करोड़ से अधिक की कथित हेराफेरी का आरोप लगाया है।

कानपुर में ₹2 करोड़ का बड़ा घोटाला: नकली ट्रांसपोर्ट बिल बनाकर अकाउंटेंट ने उड़ाए कंपनी के पैसे

Team The420
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कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक निजी कंपनी में बड़े वित्तीय घोटाले का मामला सामने आया है, जहां एक अकाउंटेंट पर आरोप है कि उसने फर्जी ट्रांसपोर्ट बिल और कागजात तैयार कर ₹2 करोड़ से अधिक की रकम का गबन किया। मामला तब सामने आया जब कंपनी के आंतरिक ऑडिट में खातों में भारी अनियमितताएं पाई गईं, जिसके बाद प्रबंधन ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

जानकारी के अनुसार, यह पूरा मामला जाजमऊ स्थित एक निजी फर्म से जुड़ा है। कंपनी के मालिक मोहम्मद शहनवाज ने शिकायत में बताया कि आरोपी सुरेश कुमार पिछले लगभग पांच वर्षों से कंपनी में अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत था और ट्रांसपोर्ट पेमेंट्स तथा वित्तीय रिकॉर्ड संभालने की जिम्मेदारी उसी के पास थी। इसी पद का दुरुपयोग कर उसने धीरे-धीरे फर्जीवाड़े का पूरा नेटवर्क खड़ा कर दिया।

जांच में सामने आया है कि आरोपी ने फर्जी ट्रांसपोर्ट बिल और नकली दस्तावेज तैयार कर कंपनी के खातों से लगातार भुगतान मंजूर कराए। शुरुआत में ये लेन-देन सामान्य दिखते रहे, लेकिन समय के साथ जब ऑडिट किया गया तो बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां उजागर हुईं। ऑडिट रिपोर्ट में कई ऐसे भुगतान मिले जिनका वास्तविक ट्रांसपोर्ट या सप्लाई से कोई संबंध नहीं था।

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पुलिस जांच के मुताबिक, आरोपी ने एक समानांतर फर्जी बिलिंग सिस्टम तैयार किया था, जिसके जरिए कंपनी से रकम निकालकर अलग-अलग खातों में ट्रांसफर की जाती थी। शुरुआती जांच में यह भी सामने आया है कि यह पैसा सिर्फ आरोपी के खाते तक सीमित नहीं था, बल्कि उसके परिवार और करीबियों से जुड़े बैंक खातों में भी ट्रांसफर किया गया।

सूत्रों के अनुसार, गबन की गई राशि का इस्तेमाल जमीन खरीदने, आभूषण लेने और इलेक्ट्रॉनिक सामानों की खरीद में किया गया। कुछ रकम को कथित तौर पर शेयर बाजार में भी निवेश किया गया है, जिससे पैसों को अलग-अलग चैनलों में घुमाकर उनकी पहचान छिपाने की कोशिश की गई।

पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है और आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी गई है। शुरुआती पूछताछ में आरोपी ने कुछ वित्तीय लेन-देन स्वीकार किए हैं, हालांकि पूरे घोटाले की वास्तविक सीमा अभी जांच के दायरे में है। पुलिस अब पिछले पांच वर्षों के बैंक लेन-देन और कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड की गहन जांच कर रही है।

जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि क्या इस घोटाले में केवल एक व्यक्ति शामिल था या फिर अन्य कर्मचारी और बाहरी लोग भी इस फर्जीवाड़े में शामिल थे। इसके साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि कंपनी के आंतरिक नियंत्रण तंत्र में कोई बड़ी चूक हुई या उसे जानबूझकर नजरअंदाज किया गया।

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामले उन कंपनियों में अधिक देखने को मिलते हैं, जहां लंबे समय तक एक ही व्यक्ति को वित्तीय नियंत्रण की जिम्मेदारी दी जाती है और नियमित ऑडिट प्रणाली कमजोर होती है। फर्जी दस्तावेजों के जरिए किया गया यह प्रकार का घोटाला लंबे समय तक पकड़ में नहीं आता।

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि जांच का फोकस अब मनी ट्रेल को ट्रैक करने और जुड़े हुए सभी बैंक खातों की पहचान करने पर है। कई खातों में संदिग्ध लेन-देन की आशंका जताई गई है, जिनकी गहन जांच की जा रही है।

अधिकारियों ने साफ किया है कि इस मामले में जो भी व्यक्ति शामिल पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। आने वाले दिनों में इस घोटाले से जुड़े और भी खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि डिजिटल और फाइनेंशियल फॉरेंसिक टीम पूरे ट्रांजैक्शन नेटवर्क की जांच में जुटी हुई है।

यह मामला एक बार फिर निजी कंपनियों में मजबूत ऑडिट और वित्तीय निगरानी की जरूरत को उजागर करता है, ताकि इस तरह के लंबे समय तक चलने वाले घोटालों को समय रहते रोका जा सके।

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