कानपुर में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर रिटायर्ड अधिकारी और उनकी पत्नी से ₹57 लाख की ठगी का मामला सामने आया, जिसमें CISF जवान को मास्टरमाइंड बताया गया।

डिजिटल अरेस्ट’ की आड़ में ₹57 लाख की ठगी: CISF जवान निकला मास्टरमाइंड, कंबोडिया तक फैला साइबर नेटवर्क उजागर

Team The420
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कानपुर। साइबर ठगी के एक बड़े और संगठित नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए जांच में चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। पुलवामा आतंकी हमले में फंडिंग से जुड़ा भय दिखाकर एक सेवानिवृत्त सहायक निदेशक उद्योग और उनकी पत्नी को ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखकर कुल ₹57 लाख की ठगी की गई। इस पूरे मामले में मास्टरमाइंड के रूप में राउरकेला में तैनात सीआईएसएफ के एक जवान का नाम सामने आया है, जिसे ओडिशा के राउरकेला से गिरफ्तार किया गया है।

पीड़ित भैरव प्रसाद पांडेय, जो रामबाग क्षेत्र के निवासी हैं, और उनकी पत्नी को 10 अप्रैल से 18 अप्रैल के बीच लगातार डिजिटल बंधन में रखा गया। आरोपियों ने खुद को जांच एजेंसियों से जुड़ा बताते हुए कहा कि उनके खाते से आतंकवादी गतिविधियों में फंडिंग हुई है। डर और मानसिक दबाव के चलते दंपति को लगातार निगरानी में रखकर विभिन्न बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया।

जांच में सामने आया कि यह पूरा खेल बेहद संगठित तरीके से चलाया जा रहा था। गिरफ्तार आरोपियों ने खुलासा किया कि इस गिरोह का मुख्य सरगना राउरकेला में तैनात सीआईएसएफ जवान दाउद अंसारी है, जो विदेश में बैठे साइबर ठगों, विशेषकर कंबोडिया से जुड़े नेटवर्क को भारतीय बैंक खातों की व्यवस्था उपलब्ध कराता था। इन खातों के माध्यम से ठगी की रकम को अलग-अलग लेयर में ट्रांसफर किया जाता था ताकि पहचान छिपाई जा सके।

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गिरफ्तार आरोपी दाउद अंसारी ने पूछताछ में खुद को सिर्फ खातों का प्रबंधक बताया और कहा कि वह सीधे ठगी में शामिल नहीं था, बल्कि विदेशी नेटवर्क के लिए बैंकिंग सिस्टम उपलब्ध कराता था। हालांकि, जांच एजेंसियां उसके दावों की सत्यता की जांच कर रही हैं और यह भी पता लगाया जा रहा है कि उसका नेटवर्क कितना गहरा और व्यापक है।

इस मामले में पहले ही कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। स्थानीय स्तर पर जवाहर नगर निवासी जय प्रकाश, उसके चचेरे भाई रायपुरवा निवासी विनय प्रताप सिंह, भांजे पुराना सीसामऊ निवासी शुभांकर सिंह और विक्रम सिंह को हिरासत में लिया गया था। इसके अलावा झारखंड के बोकारो निवासी राजू ठाकुर को भी गिरफ्तार किया गया, जो इस गिरोह के लिए बैंकिंग और ट्रांजैक्शन सपोर्ट का काम करता था।

जांच एजेंसियों के अनुसार इस तरह के डिजिटल अरेस्ट मामलों में अपराधी अक्सर खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर पीड़ितों को मानसिक दबाव में डालते हैं। इस केस में भी वीडियो कॉल और लगातार धमकियों के जरिए दंपति को डराया गया और उन्हें निगरानी जैसी स्थिति में रखा गया।

इसके साथ ही यह भी सामने आया कि ठगी की रकम को तुरंत कई चैनलों में घुमाकर ट्रेसिंग से बचने की कोशिश की गई थी। फर्जी पहचान पत्रों और म्यूल अकाउंट्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर पूरा नेटवर्क संचालित किया जा रहा था।

फिलहाल जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि क्या यह गिरोह किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट का हिस्सा है। शुरुआती संकेत बताते हैं कि इसका नेटवर्क सीमाओं के पार तक फैला हो सकता है।

साइबर ठगी की इस घटना ने एक बार फिर लोगों को सतर्क रहने और किसी भी अनजान कॉल या डिजिटल धमकी पर भरोसा न करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है।

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