बेंगलुरु। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से साइबर ठगी का एक बेहद गंभीर और डराने वाला मामला सामने आया है, जिसमें ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) के नाम पर एक 61 वर्षीय व्यक्ति से ₹2.07 करोड़ की ठगी कर ली गई। ठगों ने खुद को केंद्रीय जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर पीड़ित को मानसिक दबाव में रखा और 11 दिनों के भीतर करोड़ों रुपये अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करा लिए।
पीड़ित के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत मार्च महीने में एक फोन कॉल से हुई। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को ‘नेशनल डेटा प्रोटेक्शन सेंटर’ का अधिकारी बताया और दावा किया कि पीड़ित के दस्तावेजों का दुरुपयोग किया गया है। ठग ने कहा कि मुंबई में किसी व्यक्ति ने उनके नाम पर सिम कार्ड लिया है, जिसका इस्तेमाल आपत्तिजनक गतिविधियों, धमकी भरे कॉल और ड्रग तस्करी से जुड़े मामलों में किया जा रहा है।
फर्जी केस और आतंकी लिंक से बनाया गया डर का माहौल
ठगों ने पीड़ित को यह भी बताया कि उनके खिलाफ मुंबई के कोलाबा पुलिस स्टेशन में 30 से 50 एफआईआर दर्ज हैं और मामला गंभीर है। इसके बाद पीड़ित को अलग-अलग नंबरों से कॉल आने लगे, जिनमें कॉल करने वाले खुद को NIA और ED का अधिकारी बता रहे थे।
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इन कॉल्स के जरिए पीड़ित को यह विश्वास दिलाया गया कि वह एक बड़े आपराधिक नेटवर्क में फंसा हुआ है और उसके खिलाफ जांच चल रही है। ठगों ने उसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ की स्थिति में रखते हुए लगातार निगरानी में रहने को कहा, जिससे वह किसी से संपर्क न कर सके और पूरी तरह उनके नियंत्रण में रहे।
‘वेरिफिकेशन’ और ‘केस क्लियरेंस’ के नाम पर ठगी
ठगों ने पीड़ित को बताया कि अगर वह जांच में सहयोग करेगा, तो उसका नाम साफ किया जा सकता है। इसके लिए उसे ‘वेरिफिकेशन फीस’ और ‘केस क्लियरेंस चार्ज’ के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने होंगे।
7 अप्रैल से 18 अप्रैल के बीच, पीड़ित ने RTGS के जरिए कई अलग-अलग बैंक खातों में कुल ₹2,07,04,600 ट्रांसफर कर दिए। यह पूरी प्रक्रिया इतनी सुनियोजित थी कि पीड़ित को लगातार यह भरोसा दिलाया जाता रहा कि यह सरकारी जांच का हिस्सा है और भुगतान के बाद मामला खत्म हो जाएगा।
‘डिजिटल अरेस्ट’—साइबर अपराध का नया हथियार
यह मामला ‘डिजिटल अरेस्ट’ नामक साइबर ठगी के तेजी से बढ़ते ट्रेंड को उजागर करता है। इसमें अपराधी खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर पीड़ित को डराते हैं और उसे मानसिक रूप से अलग-थलग कर देते हैं।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है, “डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का बेहद खतरनाक रूप है, जिसमें अपराधी पीड़ित को डर और दबाव में रखकर उससे मनचाही कार्रवाई करवाते हैं। वे खुद को जांच एजेंसियों से जुड़ा बताकर विश्वसनीयता बढ़ाते हैं और फिर ‘कानूनी कार्रवाई’ के डर से पैसे ट्रांसफर करवा लेते हैं।”
मनोवैज्ञानिक दबाव बना सबसे बड़ा हथियार
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के मामलों में तकनीक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल किया जाता है। ठग पीड़ित को लगातार यह महसूस कराते हैं कि वह गंभीर कानूनी संकट में है और तुरंत कार्रवाई नहीं करने पर उसे गिरफ्तार किया जा सकता है।
इसी डर के कारण पीड़ित बिना किसी पुष्टि के पैसे ट्रांसफर कर देता है। कई मामलों में पीड़ित को फोन या वीडियो कॉल पर घंटों ‘निगरानी’ में रखा जाता है, ताकि वह किसी और से सलाह न ले सके।
कैसे बचें ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे जाल से
विशेषज्ञों का कहना है कि कोई भी जांच एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के जरिए पैसे ट्रांसफर करने के निर्देश नहीं देती। अगर कोई व्यक्ति खुद को NIA, ED या किसी सरकारी संस्था का अधिकारी बताकर पैसे मांगता है, तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए।
ऐसी स्थिति में कॉल को काटकर संबंधित एजेंसी के आधिकारिक नंबर पर संपर्क करना जरूरी है। किसी भी अनजान खाते में पैसे ट्रांसफर करने से बचें और अपनी निजी जानकारी साझा न करें।
जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव
यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि साइबर अपराधी अब लोगों के डर और भावनाओं का फायदा उठाकर बड़े स्तर पर ठगी कर रहे हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे नए तरीके आम लोगों के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं।
ऐसे मामलों में समय रहते शिकायत दर्ज कराना बेहद जरूरी है, ताकि ट्रांजैक्शन को ट्रैक कर रिकवरी की संभावना बढ़ाई जा सके। सतर्कता, जागरूकता और सही समय पर कार्रवाई ही इस तरह के साइबर जाल से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।
