हैदराबाद। डिजिटल भुगतान के बढ़ते दौर में QR कोड ने कारोबार को आसान बनाया है, लेकिन अब यही सुविधा कई व्यापारियों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बनती जा रही है। तेलंगाना और विशेष रूप से हैदराबाद में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां साइबर ठगी से जुड़ी रकम अनजाने में व्यापारियों के खातों तक पहुंच रही है। इसके बाद जब जांच एजेंसियां धोखाधड़ी की रकम का स्रोत और प्रवाह खंगालती हैं तो संबंधित व्यापारी भी जांच के दायरे में आ जाते हैं और कई मामलों में उनके बैंक खाते फ्रीज कर दिए जाते हैं।
स्थिति ऐसी बन रही है कि कई व्यापारी, जिनका अपराध से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता, अचानक अपनी पूंजी और बैंकिंग सुविधाओं तक पहुंच खो बैठते हैं। इससे उनके रोजमर्रा के कारोबार, कर्मचारियों के वेतन भुगतान और माल की खरीद जैसी गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।
जानकारी के अनुसार, साइबर ठग और कथित म्यूल अकाउंट संचालक अवैध तरीके से प्राप्त धन को विभिन्न माध्यमों से खपाने की कोशिश करते हैं। इस प्रक्रिया में वे दुकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और मॉल में खरीदारी करते हैं तथा नकद भुगतान के बजाय QR कोड स्कैन कर डिजिटल भुगतान कर देते हैं। व्यापारी के लिए यह लेनदेन सामान्य ग्राहक द्वारा किया गया वैध भुगतान प्रतीत होता है, लेकिन बाद में पता चलता है कि उपयोग की गई रकम किसी साइबर धोखाधड़ी से जुड़ी थी।
जब पीड़ित व्यक्ति शिकायत दर्ज कराता है और जांच शुरू होती है, तब पुलिस एवं साइबर अपराध जांच इकाइयां धन के प्रवाह का पता लगाते हुए उन सभी खातों तक पहुंचती हैं, जिनमें वह रकम गई होती है। इसी क्रम में व्यापारी के खाते भी जांच के दायरे में आ जाते हैं और कई बार एहतियातन उन्हें फ्रीज कर दिया जाता है।
व्यापारिक संगठनों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई का असर केवल बैंकिंग संचालन तक सीमित नहीं रहता। छोटे और मध्यम स्तर के व्यापारियों के लिए बैंक खाता कारोबार की जीवनरेखा होता है। खाते पर रोक लगते ही नए माल की खरीद, सप्लायरों को भुगतान, कर्मचारियों के वेतन और अन्य वित्तीय दायित्वों का निर्वहन मुश्किल हो जाता है।
तेलंगाना वाइन डीलर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने भी ऐसे मामलों पर चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि हाल के महीनों में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां दुकानदारों ने सामान्य बिक्री की थी, लेकिन बाद में पता चला कि भुगतान साइबर अपराध से जुड़े धन से किया गया था। इसके परिणामस्वरूप संबंधित व्यावसायिक खाते जांच के दौरान फ्रीज कर दिए गए।
साइबर अपराध विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था में पारदर्शिता होने के बावजूद व्यापारी के लिए यह पहचानना लगभग असंभव होता है कि ग्राहक द्वारा भेजी गई राशि वैध आय से आई है या किसी धोखाधड़ी का हिस्सा है। ऐसे में केवल भुगतान प्राप्त करने के आधार पर व्यापारी को अपराध से जोड़कर देखना उचित नहीं माना जा सकता, हालांकि जांच एजेंसियों के लिए धन के प्रवाह का पता लगाना भी आवश्यक होता है।
एक वरिष्ठ साइबर अपराध अधिकारी के अनुसार, किसी भी शिकायत के बाद धन की पूरी श्रृंखला की जांच की जाती है और संबंधित खातों पर आवश्यक कार्रवाई की जाती है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि जिन लोगों की भूमिका केवल लेनदेन प्राप्त करने तक सीमित होती है और जिनकी अपराध में कोई संलिप्तता नहीं पाई जाती, उन्हें राहत दिलाने की प्रक्रिया भी मौजूद है।
अधिकारियों के मुताबिक, ऐसे प्रभावित नागरिकों और व्यापारियों को ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) प्राप्त करने में सहायता दी जा रही है ताकि जांच की आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद बैंक खातों पर लगी रोक हटाई जा सके और सामान्य बैंकिंग सेवाएं बहाल हो सकें।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि व्यापारियों को डिजिटल भुगतान का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना चाहिए, संदिग्ध बड़े लेनदेन पर सतर्क रहना चाहिए और किसी भी जांच की स्थिति में संबंधित दस्तावेज तुरंत उपलब्ध कराने चाहिए। वहीं व्यापारिक संगठनों ने मांग की है कि ऐसे मामलों में निर्दोष कारोबारियों को अनावश्यक वित्तीय नुकसान से बचाने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश और त्वरित राहत तंत्र विकसित किया जाए।
