चंडीगढ़। हरियाणा स्टेट एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड (HSAMB) में सामने आए करीब ₹10 करोड़ के कथित वित्तीय घोटाले के मामले में सरकार ने सख्त कार्रवाई करते हुए एक वरिष्ठ अधिकारी को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। इस पूरे मामले की जांच अब केंद्रीय जांच ब्यूरो CBI को सौंप दी गई है, जिससे केस ने राष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता हासिल कर ली है।
अधिकारियों के अनुसार, प्रारंभिक जांच में वित्तीय अनियमितताओं, फर्जी बिलिंग और भुगतान प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ियों के संकेत मिले हैं। इसके बाद विभाग ने आंतरिक जांच रिपोर्ट के आधार पर आरोपी अधिकारी के खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई की।
मामले की शुरुआत तब हुई जब वित्तीय ऑडिट के दौरान कुछ भुगतान रिकॉर्ड और परियोजना खर्चों में असामान्य विसंगतियां सामने आईं। जांच में पाया गया कि कई बिल ऐसे कार्यों के लिए पास किए गए, जो या तो पूरी तरह से अधूरे थे या फिर वास्तविक रूप से किए ही नहीं गए थे।
सूत्रों के अनुसार, संदिग्ध लेनदेन में कई ठेकेदारों और मध्यस्थों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। शुरुआती अनुमान के मुताबिक, यह पूरा मामला लंबे समय से चल रहे एक संगठित वित्तीय गड़बड़ी नेटवर्क की ओर इशारा करता है, जिसमें सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाकर सरकारी फंड को गलत तरीके से डायवर्ट किया गया।
सरकारी स्तर पर इस मामले को बेहद गंभीर माना जा रहा है क्योंकि यह सीधे तौर पर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग से जुड़ा है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि किसी भी स्तर पर लापरवाही या भ्रष्टाचार पाए जाने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी और किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा।
जांच एजेंसियों को अब विस्तृत वित्तीय रिकॉर्ड, टेंडर फाइलें और भुगतान मंजूरी से जुड़े सभी दस्तावेज सौंप दिए गए हैं। सीबीआई अब यह भी जांच करेगी कि क्या इस घोटाले में केवल एक अधिकारी की भूमिका थी या फिर इसमें विभागीय स्तर पर अन्य लोग भी शामिल थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में अक्सर फर्जी वर्क ऑर्डर, ओवर-इनवॉइसिंग और बिना सत्यापन भुगतान जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे सरकारी सिस्टम में पारदर्शिता की कमी का फायदा उठाकर बड़ी रकम इधर-उधर कर दी जाती है।
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इस केस ने एक बार फिर सरकारी खरीद और भुगतान प्रणाली में डिजिटल निगरानी और रियल-टाइम ऑडिट की जरूरत को उजागर किया है। प्रशासनिक हलकों में भी यह चर्चा तेज है कि यदि समय पर ऑडिट नहीं होता, तो घोटाले की राशि और बढ़ सकती थी।
विभाग ने अब सभी संबंधित परियोजनाओं का दोबारा ऑडिट कराने के निर्देश दिए हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं अन्य वित्तीय अनियमितताएं तो नहीं हुई हैं।
सीबीआई जांच के बाद यह भी स्पष्ट होगा कि फंड डायवर्जन का पूरा पैटर्न क्या था और किन बैंक खातों या संस्थाओं के जरिए रकम को आगे बढ़ाया गया।
इस कार्रवाई के बाद विभागीय स्तर पर हड़कंप मचा हुआ है और अन्य अधिकारियों की फाइलों की भी जांच शुरू कर दी गई है। कई परियोजनाओं के रिकॉर्ड अब रिव्यू के तहत हैं।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां या प्रशासनिक कार्रवाई संभव है, क्योंकि जांच का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है।
फिलहाल पूरा ध्यान फाइनेंशियल ट्रेल को ट्रेस करने और यह सुनिश्चित करने पर है कि सरकारी फंड का दुरुपयोग किन-किन स्तरों पर हुआ।
यह मामला न केवल एक बड़े घोटाले को उजागर करता है, बल्कि सिस्टम में मौजूद खामियों और निगरानी तंत्र की कमजोरियों पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
