मुंबई। ₹58.13 करोड़ के बहुचर्चित ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर ठगी मामले में एक अहम मोड़ सामने आया है, जहां सत्र न्यायालय ने आरोपी को जमानत दे दी है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग या फंड ट्रांसफर में भूमिका साबित करने के लिए स्वतंत्र और ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा है।
यह मामला नोडल साइबर पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था और इसकी शुरुआत अक्टूबर 2025 में एक व्यापारी की शिकायत से हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि ठगों ने खुद को TRAI, CBI और साइबर क्राइम अधिकारियों के रूप में पेश कर पीड़ित को लगातार वीडियो और ऑडियो निगरानी में रखकर मानसिक दबाव बनाया और उसे “डिजिटल अरेस्ट” की स्थिति में डाल दिया।
लगातार डर और धमकी के माहौल में पीड़ित ने अलग-अलग बैंक खातों में कई किस्तों में कुल ₹58.13 करोड़ ट्रांसफर कर दिए। जांच एजेंसियों के अनुसार यह एक संगठित साइबर फ्रॉड नेटवर्क था, जिसमें फर्जी कॉलर्स, ऑपरेटर्स और फाइनेंशियल चैनल्स के जरिए पैसों को अलग-अलग लेयर में घुमाया गया।
जांच के दौरान पुलिस ने दावा किया कि ठगी की गई रकम में से करीब ₹15.25 करोड़ गुजरात स्थित एक एंटिटी से जुड़े बैंक खाते के जरिए आगे भेजे गए थे। यह खाता कथित तौर पर मनी ट्रेल को छिपाने के लिए इस्तेमाल किए गए कई लेयर्स में से एक था।
इस मामले में गिरफ्तार आरोपी बिपिनगिरी रमेशगिरी गोस्वामी को नवंबर 2025 में हिरासत में लिया गया था। जांच एजेंसियों का आरोप था कि उसने एक मैकेनिकल वर्क्स फर्म के बैंक अकाउंट की डिटेल्स उपलब्ध कराकर अवैध फंड ट्रांसफर में मदद की, जिसके जरिए करोड़ों रुपये अलग-अलग खातों में भेजे गए।
हालांकि जमानत सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कहा कि आरोपी के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक सबूत नहीं है जो उसकी सक्रिय भूमिका को साबित करता हो। अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि अभियोजन का पूरा मामला मुख्य रूप से एक सह-आरोपी के बयान पर आधारित है।
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अदालत ने यह भी कहा कि चार्जशीट में भी ऐसे ठोस साक्ष्य नहीं हैं जो आरोपी को सीधे फंड ट्रांसफर या लॉन्ड्रिंग से जोड़ते हों। साथ ही, कोर्ट ने यह नोट किया कि इसी केस में एक अन्य आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता के आधार पर राहत दी जा सकती है।
अदालत ने टिप्पणी की कि “जब तक स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं होते, तब तक केवल आरोपों के आधार पर हिरासत जारी रखना उचित नहीं है।”
अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया था कि आरोपी एक बड़े साइबर लॉन्ड्रिंग नेटवर्क का हिस्सा था, जो मल्टी-लेयर ट्रांजैक्शन के जरिए अवैध धन को आगे बढ़ाने में मदद करता था। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि इतने गंभीर मामलों में केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि मजबूत तकनीकी और वित्तीय सबूत जरूरी हैं।
साइबर क्राइम विशेषज्ञों के अनुसार, ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड का यह एक बढ़ता हुआ पैटर्न है, जिसमें अपराधी खुद को सरकारी अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और उन्हें तत्काल पैसे ट्रांसफर करने पर मजबूर करते हैं। इस तरह के गिरोह फर्जी पहचान, वॉयस कॉल्स और म्यूल अकाउंट्स का इस्तेमाल करके पूरे पैसे के ट्रेल को जटिल बना देते हैं।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ऐसे मामलों में फॉरेंसिक ऑडिट, बैंक लॉग्स और डिजिटल फुटप्रिंट्स के बिना दोष सिद्ध करना बेहद कठिन होता है।
फिलहाल मामले की जांच जारी है और एजेंसियां पूरे फंड ट्रेल को खंगालने में जुटी हैं। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि आगे चलकर इस नेटवर्क से जुड़े और लोगों पर कार्रवाई हो सकती है।
