चंडीगढ़। हरियाणा से जुड़े ₹590 करोड़ के चर्चित बैंक घोटाले में जांच एजेंसी ने अदालत में पेश रिपोर्ट में बड़ा खुलासा किया है। एजेंसी के अनुसार, इस मामले में आरोपी स्वाति सिंगला और उनके भाई अभिषेक सिंगला तक कथित तौर पर ₹292 करोड़ की राशि पहुंचाई गई। यह धन विभिन्न सरकारी विभागों के खातों से निकालकर बैंकिंग चैनल के जरिए ट्रांसफर किया गया और बाद में अलग-अलग कंपनियों व व्यक्तियों के माध्यम से आगे खपाया गया।
जांच में सामने आया है कि यह पूरा घोटाला सुनियोजित तरीके से फर्जी दस्तावेजों, बैंक रिकॉर्ड में हेरफेर और शेल कंपनियों के इस्तेमाल के जरिए अंजाम दिया गया। सिंगला भाई-बहन ‘स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट’ नामक फर्म से जुड़े बताए गए हैं, जिसके खातों में भारी रकम ट्रांसफर की गई। एजेंसी का कहना है कि इस फर्म का इस्तेमाल सरकारी धन को डायवर्ट करने और आगे विभिन्न खातों में भेजने के लिए किया गया।
मामले में दर्ज एफआईआर के अनुसार, इस घोटाले की शुरुआत राज्य स्तर पर दर्ज एक शिकायत से हुई थी, जिसके बाद 8 अप्रैल को विस्तृत केस दर्ज किया गया। आरोपों में भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक साजिश और फर्जी दस्तावेजों के उपयोग जैसी गंभीर धाराएं शामिल हैं। शुरुआती जांच में ही यह स्पष्ट हो गया था कि मामला सीमित स्तर का नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क के जरिए संचालित बड़े वित्तीय अपराध का हिस्सा है।
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17 अप्रैल को अदालत ने इस मामले में छह आरोपियों—रिभव ऋषि, अभय कुमार, स्वाति सिंगला, अभिषेक सिंगला, मनीष जिंदल और नरेश कुमार—को तीन दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा। जांच एजेंसी ने अदालत को बताया कि रिभव ऋषि इस पूरे घोटाले का कथित मास्टरमाइंड है। वह एक बैंक में मैनेजर के पद पर तैनात रहा और उसके कार्यकाल के दौरान संदिग्ध लेन-देन का बड़ा हिस्सा हुआ। बाद में दूसरे बैंक में जाने के बाद भी कथित अनियमितताएं जारी रहीं।
अभय कुमार, जो एक अन्य बैंक में रिलेशनशिप मैनेजर के पद पर था, को भी इस घोटाले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला आरोपी बताया गया है। जांच के मुताबिक, उसके कार्यकाल में कई सरकारी विभागों के खाते खोले गए, जिनका इस्तेमाल योजनाबद्ध तरीके से धन के ट्रांसफर और हेरफेर के लिए किया गया। एजेंसी का दावा है कि इन खातों के जरिए बड़ी मात्रा में सरकारी धन को नियंत्रित और डायवर्ट किया गया।
मामले में मनीष जिंदल और नरेश कुमार की भूमिका कथित तौर पर ‘मिडिलमैन’ की रही, जिन्होंने विभिन्न सरकारी विभागों के नाम पर बैंक खाते खुलवाने में मदद की। जांच एजेंसी के अनुसार, ये दोनों आरोपी मुख्य आरोपियों के संपर्क में थे, उनसे नकद राशि प्राप्त करते थे और कथित अवैध लाभ को आगे साझा करते थे। इससे यह संकेत मिलता है कि घोटाले में बैंकिंग सिस्टम के साथ-साथ बाहरी नेटवर्क की भी सक्रिय भागीदारी थी।
अदालत में पेश दलीलों में जांच एजेंसी ने कहा कि सभी आरोपी इस व्यापक साजिश के अहम हिस्से हैं और इनके पास ऐसे तथ्य हैं जो पूरे नेटवर्क का खुलासा कर सकते हैं। आरोप है कि इन लोगों ने मिलकर नए खाते खुलवाए, पुराने खातों से रकम ट्रांसफर की, बैंक रिकॉर्ड में हेरफेर किया और फर्जी दस्तावेज तैयार कर सरकारी धन को शेल कंपनियों तक पहुंचाया।
बचाव पक्ष ने सभी आरोपों को निराधार बताया, लेकिन अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और अब तक सामने आए तथ्यों को देखते हुए माना कि मामले की गहन जांच जरूरी है। इसी आधार पर आरोपियों की पुलिस रिमांड मंजूर की गई, ताकि पूछताछ के दौरान और अहम साक्ष्य जुटाए जा सकें।
जांच एजेंसी को आशंका है कि यह घोटाला और भी व्यापक हो सकता है और इसमें कई अन्य लोग व संस्थाएं शामिल हो सकती हैं। आने वाले दिनों में बैंकिंग ट्रांजेक्शनों, डिजिटल रिकॉर्ड और फंड फ्लो की गहराई से जांच कर इस नेटवर्क के अन्य कड़ियों तक पहुंचने की कोशिश की जाएगी। फिलहाल, इस मामले ने सरकारी खातों की सुरक्षा और बैंकिंग सिस्टम में निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं
