अहमदाबाद। गुजरात हाईकोर्ट ने एक महिला LLB छात्रा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है, जिस पर आरोप है कि उसने खुद को वकील बताकर कई लोगों से करीब ₹80 लाख की ठगी की। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए कस्टोडियल पूछताछ आवश्यक है, ताकि कथित साजिश की पूरी परतें खोली जा सकें और अन्य पीड़ितों तथा संभावित सहयोगियों की पहचान हो सके।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कानूनी पेशे को इस तरह की कथित धोखाधड़ी और पहचान के दुरुपयोग से बदनाम नहीं होने दिया जा सकता। पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया यह संकेत देती है कि यह मामला सुनियोजित तरीके से की गई धोखाधड़ी और फर्जी पहचान के इस्तेमाल से जुड़ा हो सकता है।
मामला मेहसाणा जिले के कडी पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है, जो भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की कई धाराओं के तहत दर्ज की गई है। इनमें धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और पहचान छिपाकर ठगी करने जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। शिकायत के अनुसार, आरोपी ने अपने कुछ कथित साथियों के साथ मिलकर खुद को एक प्रैक्टिसिंग एडवोकेट बताकर लोगों को कानूनी सहायता और केस निपटाने के नाम पर पैसे देने के लिए प्रेरित किया।
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जांच के दौरान पुलिस को कई संदिग्ध सामग्री मिलने का दावा किया गया है, जिसने आरोपों को और मजबूत किया है। इनमें गुजरात बार काउंसिल के नाम पर जारी एक आईडी कार्ड, सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट बताने वाले नाम प्लेट, पुलिस स्टेशनों जैसी सीलें, नोटरी सील, केस रजिस्टर और अन्य कानूनी दस्तावेज जैसे दिखने वाले कागजात शामिल हैं। जांच एजेंसियों का कहना है कि ये सामग्री यह संकेत देती है कि कथित रूप से कानूनी पहचान का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया गया हो सकता है।
कोर्ट को यह भी बताया गया कि शुरुआती एफआईआर दर्ज होने के बाद 1 फरवरी 2026 को कई और शिकायतकर्ता सामने आए, जिससे कथित ठगी की कुल राशि बढ़कर लगभग ₹80 लाख तक पहुंच गई। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि यह कोई एकल घटना नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा नेटवर्क और व्यवस्थित योजना हो सकती है।
वहीं, आरोपी पक्ष ने सभी आरोपों से इनकार किया है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी एक अंतिम वर्ष की LLB छात्रा है और केवल इंटर्नशिप के दौरान दस्तावेज़ी काम में मदद कर रही थी। यह भी कहा गया कि उसने कभी किसी केस में वकालतनामा दाखिल नहीं किया और न ही अदालत में वकालत की भूमिका निभाई।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि शिकायत में देरी हुई है और कथित घटनाएं एक लंबे समय (जनवरी 2025 से फरवरी 2026) तक फैली हुई हैं, जिससे आरोपों की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा कि यह मामला गलतफहमी और गलत आरोपों का परिणाम है।
हालांकि, अभियोजन पक्ष ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि जांच में मिले सबूत स्पष्ट रूप से धोखाधड़ी और पहचान के दुरुपयोग की ओर इशारा करते हैं। उन्होंने कहा कि कस्टोडियल पूछताछ जरूरी है ताकि पैसे के लेन-देन, नेटवर्क और अन्य संभावित पीड़ितों का पता लगाया जा सके।
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने माना कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और शुरुआती चरण में इन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि इस स्तर पर राहत दी जाती है तो जांच प्रभावित हो सकती है और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानूनी पेशे से जुड़ी पहचान का दुरुपयोग न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को सीधे प्रभावित करता है, इसलिए ऐसे मामलों में सख्त जांच आवश्यक है।
अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि कस्टोडियल पूछताछ उचित और जरूरी है, ताकि जांच पूरी तरह निष्पक्ष और प्रभावी तरीके से आगे बढ़ सके। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि ये टिप्पणियां केवल जमानत याचिका तक सीमित हैं और मुकदमे के अंतिम निर्णय पर कोई असर नहीं डालेंगी।
अब मामले की जांच आगे बढ़ेगी, जिसमें वित्तीय लेन-देन, डिजिटल रिकॉर्ड और संपर्कों की गहन जांच की जाएगी। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश करेंगी कि क्या इस कथित धोखाधड़ी में कोई बड़ा नेटवर्क शामिल है और कितने लोग इससे प्रभावित हुए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला फर्जी पहचान और पेशेवर पदों के दुरुपयोग से जुड़े बढ़ते मामलों की ओर इशारा करता है, जो गंभीर चिंता का विषय है। फिलहाल, मामला जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया के अधीन है।
