मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) के नाम पर ‘मामला सेटल’ कराने का झांसा देकर एक अस्पताल संचालक से ₹15 लाख नकद वसूलने का मामला सामने आया है। ठगों ने साइबर जालसाजी की तर्ज पर कई चरणों में कॉल कर भरोसा जीता और अंत में दफ्तर परिसर के बाहर कैश लेने की योजना बनाई। पीड़ित डॉ. राजेश राय, संचालक—न्यू राजेश हाईटेक अस्पताल, ने मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई है।
घटना की पृष्ठभूमि में 1 फरवरी को अस्पताल में आयोजित मोतियाबिंद सर्जरी कैंप है, जिसमें 30 मरीजों का ऑपरेशन हुआ था। बाद में नौ मरीजों की आंखों में संक्रमण की शिकायत सामने आई। जांच पूरी होने तक अस्पताल पर अस्थायी रोक लगी। इसी दबाव और अनिश्चितता का फायदा उठाते हुए ठगों ने खुद को पहले शासन से जुड़ा अधिकारी, फिर सीएम का ओएसडी और अंत में सीएमओ का सहायक बताकर संपर्क साधा।
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पीड़ित के अनुसार, अलग-अलग मोबाइल नंबरों से तीन चरणों में कॉल आईं। हर कॉल में यह भरोसा दिलाया गया कि अस्पताल के खिलाफ “फर्जी कार्रवाई” नहीं होगी और मामला निपटा दिया जाएगा। चौथे चरण में 8419022640 नंबर से व्हाट्सएप कॉल कर ₹15 लाख की मांग की गई और डिलीवरी पॉइंट सीएमओ कार्यालय परिसर के पास स्थित हनुमान मंदिर तय किया गया। तय समय पर पीड़ित ने झोले में नकदी सौंप दी। पैसे लेने वाले ने आश्वस्त किया कि “एक-दो दिन में काम हो जाएगा।” उसी रात अस्पताल का लाइसेंस निरस्त होने की जानकारी मिली, जिसके बाद ठगी का अहसास हुआ।
जांच में सामने आया है कि जिस नंबर से कॉल की गई, वह लखीमपुर खीरी के पते पर पंजीकृत है, जबकि उसकी सक्रियता महाराष्ट्र में पाई गई। कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), सिम पंजीकरण और संभावित लोकेशन की जांच की जा रही है। सीसीटीवी फुटेज—सीएमओ कार्यालय के आसपास के 15 दिनों का—सुरक्षित कर तकनीकी टीम से खंगाला जा रहा है। फुटेज में कैश लेने वाले की पहचान के संकेत मिले हैं और जिन नंबरों पर कॉल आई, उनके लिंक भी खंगाले जा रहे हैं। जालसाज की तलाश में एक टीम महाराष्ट्र रवाना की गई है।
सूत्रों के मुताबिक, ठगों ने जानबूझकर बैंक ट्रांसफर के बजाय नकद वसूली का तरीका चुना, ताकि संदेह कम रहे और ट्रांजेक्शन ट्रेल न बने। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में अपराधी पहले पीड़ित की स्थिति और दबाव का आकलन करते हैं, फिर “ऊपर तक बात” होने का हवाला देकर भरोसा बनाते हैं। अंत में भीड़भाड़ या सरकारी परिसरों के आसपास कैश डिलीवरी तय कर लेते हैं, ताकि पहचान मुश्किल हो।
इस बीच, संबंधित अधिकारी के संज्ञान में मामला आने पर केस दर्ज कराया गया। यह भी पड़ताल हो रही है कि ठगी के समय सिम किस डिवाइस में चल रहा था और किन-किन नंबरों से उसका संपर्क रहा। पुलिस यह जानने की कोशिश कर रही है कि क्या इसी पैटर्न पर अन्य लोगों से भी वसूली हुई है। कुल रकम और संभावित पीड़ितों की संख्या का आकलन जारी है।
सावधानी के संकेत
- किसी भी “सेटलमेंट” या लाइसेंस/जांच से जुड़ी रकम नकद देने का दबाव लाल झंडा है।
- व्हाट्सएप कॉल/डीपी पर अधिकारी का नाम दिखना पहचान का प्रमाण नहीं।
- आधिकारिक संचार प्रायः लिखित/ईमेल/नोटिस के जरिए होता है; निजी नंबरों से मांग संदिग्ध है।
- संदेह की स्थिति में सीधे कार्यालय के अधिकृत लैंडलाइन/पब्लिक डोमेन संपर्क पर पुष्टि करें।
फिलहाल जांच तेज है। तकनीकी विश्लेषण और फुटेज के आधार पर जल्द खुलासा होने की उम्मीद जताई जा रही है। पीड़ितों से आगे आकर शिकायत दर्ज कराने की अपील की गई है, ताकि पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश कर रकम की रिकवरी की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।
