कैलिफोर्निया में किए गए एक ताज़ा प्राइवेसी ऑडिट ने वैश्विक टेक इंडस्ट्री की डेटा सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार Google, Microsoft और Meta जैसी बड़ी टेक कंपनियाँ उपयोगकर्ताओं द्वारा दिए गए “ऑप्ट-आउट” या डेटा शेयरिंग बंद करने के स्पष्ट संकेतों को अनदेखा कर रही हैं और इसके बावजूद ट्रैकिंग कुकीज़ सक्रिय रख रही हैं।
webXray द्वारा मार्च 2026 में किए गए कैलिफोर्निया प्राइवेसी ऑडिट में सामने आया कि 194 से अधिक ऑनलाइन विज्ञापन सेवाएँ ऐसे संकेतों के बाद भी कुकीज़ सेट कर रही हैं, जबकि उपयोगकर्ता Global Privacy Control (GPC) के माध्यम से स्पष्ट रूप से अपनी सहमति वापस ले चुके होते हैं। यह व्यवस्था California Consumer Privacy Act (CCPA) के तहत कानूनी रूप से बाध्यकारी मानी जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार अध्ययन में शामिल वेबसाइटों में से लगभग 55 प्रतिशत ऐसी थीं जो यूज़र के ऑप्ट-आउट के बावजूद विज्ञापन कुकीज़ सक्रिय रखती रहीं। यह स्थिति डिजिटल विज्ञापन इकोसिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर गंभीर चिंता पैदा करती है।
ऑडिट में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि Google, Microsoft और Meta जैसी कंपनियाँ तकनीकी रूप से GPC संकेत प्राप्त करने के बावजूद उन्हें लागू नहीं कर रहीं।
Google के मामले में 86 प्रतिशत तक की विफलता दर दर्ज की गई, जहाँ उसके विज्ञापन सर्वर “sec-gpc: 1” संकेत मिलने के बावजूद “IDE” नामक विज्ञापन कुकी सक्रिय कर देते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यदि चाहें तो Google HTTP 451 जैसे रेस्पॉन्स कोड के माध्यम से ट्रैकिंग रोक सकता है, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा।
Microsoft के विज्ञापन नेटवर्क में लगभग 50 प्रतिशत मामलों में “MUID” ट्रैकिंग कुकी उपयोगकर्ता की अनुमति के बिना सक्रिय पाई गई। वहीं Meta के ट्रैकिंग पिक्सल सिस्टम में GPC संकेत को पहचानने की कोई व्यवस्था ही नहीं है, जिससे वेबसाइट पर विज़िट करते ही डेटा ट्रैकिंग शुरू हो जाती है।
एक शोधकर्ता ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा, “यह केवल तकनीकी खामी नहीं बल्कि डिज़ाइन स्तर पर अनुपालन की कमी को दर्शाता है, जहाँ यूज़र की सहमति को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है।”
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इस पूरे मामले पर Future Crime Research Foundation (FCRF) ने अपनी प्रारंभिक साइबर प्राइवेसी विश्लेषण रिपोर्ट में गंभीर चिंता जताई है। फाउंडेशन से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल विज्ञापन सिस्टम में कंसेंट (consent) को अक्सर केवल इंटरफेस स्तर पर लागू दिखाया जाता है, जबकि बैकएंड में डेटा ट्रैकिंग लगातार जारी रहती है। FCRF के अनुसार यह संरचनात्मक गैप भविष्य में बड़े स्तर पर डेटा मिसयूज, अनऑथराइज्ड प्रोफाइलिंग और साइबर प्राइवेसी रिस्क को बढ़ा सकता है।
इस संदर्भ में प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि इस तरह की स्थितियाँ “डिजिटल इकोसिस्टम में विश्वास की नींव को कमजोर करती हैं।” उनके अनुसार, “जब ऑप्ट-आउट जैसे स्पष्ट कानूनी संकेतों को तकनीकी स्तर पर ही दरकिनार कर दिया जाता है, तो यह केवल अनुपालन की कमी नहीं बल्कि डेटा गवर्नेंस के गंभीर संकट की ओर इशारा करता है। आने वाले समय में ऐसे मामलों पर सख्त तकनीकी और कानूनी दोनों स्तरों पर निगरानी जरूरी होगी।”
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई Consent Management Platforms (CMPs), जो वेबसाइटों पर कुकी अनुमति नियंत्रण के लिए उपयोग किए जाते हैं, स्वयं ही प्रभावी नहीं हैं। Google द्वारा प्रमाणित कुछ CMP सिस्टम में भी ऑप्ट-आउट के बाद 77 प्रतिशत से 91 प्रतिशत तक विफलता दर देखी गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या केवल तकनीकी नहीं बल्कि नियामक अनुपालन की भी है। कैलिफोर्निया नियामकों ने संकेत दिया है कि GPC को नजरअंदाज करना कानूनी उल्लंघन माना जाएगा और इसके लिए भारी जुर्माने का प्रावधान है। अनुमान के अनुसार पूरे उद्योग पर लगभग 5.8 अरब डॉलर तक की संभावित देनदारी बन सकती है।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि समाधान के लिए सर्वर-साइड ट्रैकिंग नियंत्रण, Conditional Script Loading और स्वतंत्र नेटवर्क ऑडिटिंग जैसी तकनीकों को अपनाना जरूरी है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि उपयोगकर्ता की प्राइवेसी सेटिंग्स वास्तव में लागू हो रही हैं या नहीं।
डिजिटल विज्ञापन उद्योग में यह खुलासा ऐसे समय आया है जब वैश्विक स्तर पर डेटा प्राइवेसी और यूज़र कंसेंट को लेकर नियम और सख्त किए जा रहे हैं। लेकिन इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तकनीकी दिग्गजों की मौजूदा व्यवस्था अभी भी यूज़र नियंत्रण से अधिक विज्ञापन डेटा इकोनॉमी पर केंद्रित है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या डिजिटल दुनिया में “ऑप्ट-आउट” वास्तव में प्रभावी है या केवल एक औपचारिक विकल्प बनकर रह गया है।