₹10 करोड़ के केंद्रीय अनुदान के उपयोग पर गंभीर सवाल; कागजों में खर्च, जमीनी स्तर पर काम नहीं—प्रशासनिक फैसलों की जांच तेज

“फर्जी सर्टिफिकेट, निजी ठेका और करोड़ों का खेल: यूनिवर्सिटी में रूसा फंड घोटाला उजागर”

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By Roopa
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ग्रेटर नोएडा। गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय (जीबीय) में कथित भ्रष्टाचार का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। अब राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रूसा) के तहत मिले ₹10 करोड़ के केंद्रीय अनुदान में भी बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि फंड का उपयोग कागजों में दिखाया गया, जबकि हकीकत में अधिकांश राशि खर्च ही नहीं हुई और बैंक खातों में पड़ी रही।

मामले में आरोप है कि उस समय कुलसचिव रहे डॉ. विश्वास त्रिपाठी ने फंड के उपयोग के लिए ऐसा तंत्र तैयार किया, जिसमें नियमों को दरकिनार करते हुए पूरी राशि के इस्तेमाल का दावा कर दिया गया। 16 मार्च 2021 को शिक्षा मंत्रालय को भेजे गए उपयोगिता प्रमाणपत्र में ₹10 करोड़ की पूरी राशि खर्च दिखा दी गई, जबकि जमीनी स्तर पर इस राशि से कोई ठोस कार्य नहीं कराया गया था।

सूत्रों के अनुसार, फंड के उपयोग के लिए निर्धारित प्रक्रियाओं का भी पालन नहीं किया गया। नियमानुसार ऐसे कार्यों के लिए सरकारी एजेंसी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय एक निजी एजेंसी को ठेका सौंप दिया गया। इतना ही नहीं, टेंडर प्रक्रिया और ऑडिट जैसी अनिवार्य शर्तों को भी नजरअंदाज कर दिया गया, जिससे पूरे मामले में पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

बताया जा रहा है कि नोएडा प्राधिकरण के एक प्रोजेक्ट मैनेजर ने 3 मार्च 2021 को इस संबंध में लिखित आपत्ति भी दर्ज कराई थी। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन को भेजे पत्र में स्पष्ट किया था कि कार्य आवंटन में अनियमितता बरती जा रही है और नियमों का उल्लंघन हो रहा है। हालांकि, उस समय प्रशासन ने इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

जांच में यह भी सामने आया है कि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए, उन्हें किनारे कर दिया गया। उनकी जगह पर नए सदस्यों को शामिल कर समिति का पुनर्गठन किया गया, जिससे निर्णय प्रक्रिया पर प्रभाव डाला जा सके। आरोप है कि समिति में बदलाव कर फंड के उपयोग को मनमाने तरीके से दर्शाया गया और पूरे प्रकरण को औपचारिक रूप से वैध दिखाने की कोशिश की गई।

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रूसा योजना का उद्देश्य राज्य स्तरीय उच्च शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार, बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करना है। वर्ष 2013 में शुरू की गई इस योजना के तहत विश्वविद्यालयों को नई सुविधाओं के विकास, पुराने ढांचे के उन्नयन और प्रयोगशालाओं व उपकरणों की खरीद के लिए फंड दिया जाता है। गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय को भी इसी योजना के तहत ₹10 करोड़ का अनुदान मिला था।

लेकिन आरोप है कि इस राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप नहीं किया गया। सिविल, इलेक्ट्रिकल, हॉर्टिकल्चर, सिक्योरिटी और पेंटिंग जैसे कार्यों के नाम पर गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आई हैं। कई मामलों में बिना काम कराए ही भुगतान दर्शा दिया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि फंड का दुरुपयोग योजनाबद्ध तरीके से किया गया।

सूत्रों के मुताबिक, 5 जनवरी 2021 को रूसा फंड के उपयोग के लिए गठित समिति के सदस्यों से हस्ताक्षर कराए गए थे, लेकिन बाद में उसी समिति में बदलाव कर निर्णयों को प्रभावित किया गया। इससे पूरे मामले की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए अब उच्च स्तर पर जांच की मांग तेज हो गई है। विश्वविद्यालय में एक के बाद एक सामने आ रही अनियमितताओं ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता का मामला होगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गहरा असर डाल सकता है।

फिलहाल, जांच एजेंसियां संबंधित दस्तावेजों, वित्तीय लेनदेन और फंड उपयोग के रिकॉर्ड की बारीकी से जांच कर रही हैं। आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना है, जिससे जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित पक्षों की भूमिका और स्पष्ट हो सकती है।

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